प्रफुल्ल ठाकुर.
बस्तर के एक छोटे से गांव की लड़की, जिसके पास कभी पर्वतारोहण के लिए जरूरी सामान खरीदने तक के पैसे नहीं थे. जिसे अपने अभियान के लिए स्नो बूट से लेकर जैकेट और दूसरे उपकरण तक दूसरों से उधार लेने पड़ते थे. तीन साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया. मां ने 300 रुपये की पेंशन में तीन बच्चों को पालकर बड़ा किया. लेकिन मुश्किल हालात भी नैना के इरादों को कमजोर नहीं कर सके. उन्होंने पहाड़ों को अपना रास्ता बनाया और एक दिन दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहरा दिया.
यह कहानी है छत्तीसगढ़ के बस्तर की पर्वतारोही नैना सिंह धाकड़ की. 1 जून 2021 को उन्होंने 8,848.86 मीटर ऊंचे माउंट एवरेस्ट को फतह किया. ऐसा करने वाली वे छत्तीसगढ़ की दूसरी महिला पर्वतारोही हैं. उनसे पहले 1993 में भिलाई की सविता धपवाल ने बछेंद्री पाल के साथ एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी.
जगदलपुर से करीब 17 किलोमीटर दूर टाकरागुड़ा गांव की रहने वाली नैना ने करीब एक दशक तक पहाड़ों पर चढ़ाई का अभ्यास किया. इस दौरान उन्होंने कई ऊंची चोटियां पार कीं, लेकिन उनका सबसे बड़ा सपना एवरेस्ट तक पहुंचना था. आर्थिक परेशानियों, संसाधनों की कमी और कई बार असफल होने के बावजूद उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा. आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और बस्तर की इस बेटी ने दुनिया के पर्वतारोहण इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया.

एक एनएसएस कैंप ने बदल दी जिंदगी
नैना की स्कूली शिक्षा जगदलपुर के महारानी लक्ष्मीबाई हायर सेकंडरी स्कूल में हुई. पढ़ाई के दौरान ही वे राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) से जुड़ गई थीं. इसी दौरान एक एनएसएस कैंप में उन्हें पंडरीपानी जाने का मौका मिला. यहां एक डोंगरी पर चढ़ाई करने के लिए कहा गया. नैना ने बिना किसी खास तैयारी के आसानी से चढ़ाई पूरी कर ली.
उनकी फुर्ती और संतुलन देखकर वहां मौजूद लोग हैरान रह गए. सभी ने उनकी खूब तारीफ की और उन्हें ‘माउंटेनियर नैना सिंह’ नाम दे दिया. यह बात उनके मन में बैठ गई. उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि पहाड़ों पर चढ़ना उनके लिए सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि जिंदगी का रास्ता भी बन सकता है.
साल 2010 में बस्तर विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित एनएसएस कैंप के लिए उनका चयन हुआ. इस कैंप में उन्हें हिमाचल प्रदेश जाने का अवसर मिला. वहां उन्होंने करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई तक चढ़ाई की. यह उनका पहला बड़ा अनुभव था. पहाड़ों के बीच बिताए उन दिनों ने उनके भीतर पर्वतारोहण को लेकर एक नया आत्मविश्वास पैदा किया.
नैना ने इसके बाद बस्तर विश्वविद्यालय से बीए किया. साथ ही डीसीए, पीजीडीसीए, एमएसडब्ल्यू और बीपीएड की पढ़ाई भी पूरी की. पर्वतारोहण को गंभीरता से अपनाने के बाद उन्होंने बेसिक और एडवांस माउंटेनियरिंग के अलावा एमओआई, रॉक क्लाइंबिंग, सर्च एंड रेस्क्यू जैसे कई प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूरे किए.

17 साल की उम्र में लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड तक पहुंचीं
हिमाचल प्रदेश के दौरे के बाद नैना की उपलब्धियों ने उन्हें पर्वतारोहण की दुनिया में आगे बढ़ने का अवसर दिया. उनका चयन टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की एकेडमी के लिए हुआ. यहां उनकी मुलाकात माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली भारत की पहली महिला बछेंद्री पाल से हुई.
बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में नैना को पर्वतारोहण की बारीकियां सीखने का मौका मिला. धीरे-धीरे वे उनकी टीम का अहम हिस्सा बन गईं.
इसके बाद टीम की 12 युवतियों के दल को भूटान में पर्वतारोहण अभियान पर जाने का अवसर मिला. इस अभियान में सभी ने भूटान की 11 पर्वत श्रृंखलाओं को पार किया. इस उपलब्धि को लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह मिली.
उस समय नैना की उम्र महज 17 साल थी. इतनी कम उम्र में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली थी. वे छत्तीसगढ़ की पहली इंटरनेशनल महिला पर्वतारोहियों में शामिल हो गईं.
बछेंद्री पाल के साथ काम करने और उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेने का अनुभव नैना के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा. इसी दौरान उनके भीतर एवरेस्ट पर चढ़ने का सपना और मजबूत हुआ.

एक दर्जन से ज्यादा चोटियों पर फहराया परचम
एवरेस्ट पहुंचने से पहले नैना ने कई मुश्किल पर्वतारोहण अभियानों में हिस्सा लिया. साल 2010 में उन्होंने हिमालय क्षेत्र में 12 हजार फीट तक चढ़ाई की. 2011 में भूटान के स्नोमैन ट्रैक पर 5,800 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचीं. 2012 में सिक्किम हिमालय की रिनॉक पीक और 2013 में नेपाल हिमालय में पर्वतारोहण किया.
साल 2015 में उत्तराखंड हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र में 5,800 मीटर तक चढ़ाई पूरी की. इसी साल माउंट आबू में भी अभियान का हिस्सा बनीं.
2017 में उन्होंने माउंट भागीरथी-2 पर चढ़ाई की. इसके अगले साल उनका अभियान और चुनौतीपूर्ण हो गया. मनाली से खारदुंगला, लेह और लद्दाख होते हुए उन्होंने विश्व की सबसे ऊंची मोटरेबल पास रोड तक साइकिल से सफर किया. इसके बाद लद्दाख की माउंट स्टोक कांगड़ी पर 6,153 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचीं.
साल 2018 में ही उन्होंने माउंट गोलेप कांगड़ी पर 5,950 मीटर और हिमालय की माउंट आंदुरी पर भी इतनी ही ऊंचाई तक चढ़ाई की.
2019 में नैना ने एशिया के दूसरे सबसे ऊंचे ग्लेशियर माउंट कैथिड्रल पर 6,100 मीटर और माउंट जल्दी पर 5,900 मीटर तक चढ़ाई की. इसी साल उन्होंने हिमालय के चंद्रताल ट्रैक पर 4,300 मीटर की ऊंचाई तक का सफर भी पूरा किया.
इन अभियानों ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाया. हर चढ़ाई के साथ उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया. लेकिन इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद उनके सामने एवरेस्ट तक पहुंचने की सबसे बड़ी चुनौती थी.

कभी पर्वतारोहण का सामान खरीदने के पैसे नहीं थे
नैना की सफलता की कहानी जितनी प्रेरक है, उसके पीछे का संघर्ष भी उतना ही बड़ा है. पर्वतारोहण कोई सस्ता शौक नहीं है. इसके लिए विशेष जूते, कपड़े और सुरक्षा उपकरणों की जरूरत होती है. ऊंचे पहाड़ों पर मौसम और परिस्थितियों से मुकाबला करने के लिए कई तरह के उपकरण जरूरी होते हैं.
नैना के पास शुरुआत में इन उपकरणों को खरीदने के पैसे नहीं थे. उनके पास केवल एक रकसैक था. स्नो बूट, ट्रैकिंग बूट, ट्रैकिंग सूट, जंप सूट, फेदर जैकेट, विंटर जैकेट, विंडप्रूफ जैकेट, क्रैम्पॉन, हार्नेस, कैरबीनर, जुमार, आइस एक्स, हेलमेट, टेंट, स्लीपिंग बैग और दूसरे जरूरी उपकरण उन्हें दूसरों से उधार लेने पड़ते थे.
इसके बावजूद उन्होंने पर्वतारोहण जारी रखा. कई बार आर्थिक परेशानियों के कारण उन्हें अपने अभियान टालने पड़े. एवरेस्ट पर चढ़ने का उनका पिछला प्रयास भी संसाधनों की कमी के चलते सफल नहीं हो पाया था.
लेकिन इस बार परिस्थितियां कुछ बदलीं. उनके अभियान को जिला प्रशासन और एनएमडीसी का सहयोग मिला. तत्कालीन कलेक्टर रजत बंसल ने भी उनकी मदद के लिए पहल की. जरूरी संसाधन और सहयोग मिलने के बाद नैना ने एवरेस्ट अभियान की तैयारी पूरी की.
आखिरकार 1 जून 2021 को वह दिन आ गया, जिसका इंतजार नैना को कई वर्षों से था. उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचकर अपने सपने को हकीकत में बदल दिया. बस्तर की एक ऐसी लड़की, जिसके पास कभी पर्वतारोहण के जूते तक नहीं थे, अब एवरेस्ट फतह करने वाली पर्वतारोही बन चुकी थी.
300 रुपये की पेंशन में मां ने पाला, बेटी ने दुनिया में नाम कमाया
नैना के संघर्ष की एक बड़ी वजह उनके परिवार की आर्थिक परिस्थितियां भी थीं. जब वे महज तीन साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया. उनके पिता पुलिस विभाग में आरक्षक थे. बीमारी के कारण उनकी असमय मृत्यु हो गई.
पिता के जाने के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी मां विमला ठाकुर पर आ गई. तीन भाई-बहनों में नैना दूसरे नंबर की हैं. मां को पढ़ाई-लिखाई का अवसर नहीं मिला था, इसलिए उन्हें अनुकंपा नियुक्ति भी नहीं मिल सकी. परिवार की आमदनी का एकमात्र सहारा पिता की 300 रुपये की पेंशन थी.
इसी छोटी सी रकम में विमला ने अपने तीनों बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया. बड़े भाई रवि पर बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारियां आ गई थीं. वे स्कूल भी नहीं जा सके. बाद में उन्होंने ड्राइविंग का काम शुरू किया. छोटे भाई अजय ने सातवीं तक पढ़ाई की और फिर चाय की दुकान चलाने लगे.
इन परिस्थितियों के बावजूद मां ने नैना की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी. उन्होंने बेटी को स्कूल और कॉलेज तक पहुंचाया. आगे का रास्ता नैना ने अपनी मेहनत और हौसले से खुद बनाया.
नैना अपनी मां और दोनों भाइयों को अपनी सफलता का प्रेरणास्रोत मानती हैं. उनका कहना है कि परिवार ने मुश्किल से मुश्किल समय में भी उनका साथ नहीं छोड़ा. खासकर मां ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया. वे अपनी मां को ही अपना रोल मॉडल मानती हैं.
‘छत्तीसगढ़ गाथा’ से बातचीत में मां विमला ठाकुर ने बेटी की उपलब्धि पर खुशी जाहिर की थी. उन्होंने कहा था कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है. एवरेस्ट पर पहुंचना नैना का सपना था और उसने आखिरकार इसे पूरा कर दिखाया.

बस्तर की बेटी ने बता दिया कि सपनों की ऊंचाई संसाधनों से तय नहीं होती
नैना सिंह धाकड़ की कहानी केवल एक पर्वतारोही की उपलब्धि की कहानी नहीं है. यह उस जिद और आत्मविश्वास की कहानी है, जो अभावों के बीच भी अपने लिए रास्ता तलाश लेता है. 300 रुपये की पेंशन पर गुजारा करने वाले परिवार से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचना आसान नहीं था.
नैना के पास न महंगे उपकरण थे, न बड़े संसाधन और न ही कोई आसान रास्ता. लेकिन उनके पास एक सपना था और उसे पूरा करने का संकल्प भी. उन्होंने पहाड़ों पर चढ़ते हुए हर बार अपने सामने आई मुश्किलों का सामना किया.
आज जब बस्तर की पहचान अक्सर नक्सलवाद, संघर्ष और पिछड़ेपन की खबरों तक सीमित कर दी जाती है, तब नैना जैसी बेटियां इस इलाके की एक दूसरी तस्वीर सामने रखती हैं. यह तस्वीर हौसले, प्रतिभा और संभावनाओं की है.
बस्तर के टाकरागुड़ा गांव से निकलकर एवरेस्ट की चोटी तक पहुंची नैना ने साबित किया कि किसी सपने की ऊंचाई इस बात से तय नहीं होती कि उसे देखने वाले के पास कितने संसाधन हैं. कई बार सपनों तक पहुंचने के लिए सिर्फ एक मजबूत इरादा ही काफी होता है.
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