धान की देवी लछमी और बस्तर की अनूठी लोकगाथा

छत्तीसगढ़ गाथा डेस्क.

छत्तीसगढ़ का बस्तर केवल अपनी आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और प्राकृतिक संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध कृषि परंपरा के लिए भी जाना जाता है. यहां धान सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि जीवन, लोकविश्वास और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है. बस्तर के मैदानी इलाकों में धान की खेती होती रही है, तो पहाड़ी क्षेत्रों में कोदो, कुटकी, कोसरा और दूसरे मोटे अनाज उगाए जाते रहे हैं. धान की इसी महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बस्तर में धान को लेकर एक पूरी लोकमहागाथा प्रचलित है, जिसे ‘लछमी जगार’ कहा जाता है.

इस लोकगाथा में धान को केवल अन्न नहीं, बल्कि देवी के रूप में देखा गया है। इसमें धान के जन्म, उसके धरती पर आने, खेती की शुरुआत और अलग-अलग किस्मों के बनने की कथा मिलती है. दिलचस्प बात यह है कि इस गाथा में धान के साथ दूसरी फसलों, पशु-पक्षियों और प्रकृति को भी जोड़कर देखा गया है. बस्तर की यह लोकपरंपरा बताती है कि यहां के समाज में धान का स्थान कितना महत्वपूर्ण रहा है.

लछमी जगार: धान की देवी की महागाथा

बस्तर में प्रचलित लोकमहाकाव्य ‘लछमी जगार’ धान्य संस्कृति का महत्वपूर्ण उदाहरण है. इस लोकगाथा के अलग-अलग स्थानीय रूप मिलते हैं, लेकिन दोनों के केंद्र में धान की महत्ता और उसके जीवन से जुड़ाव की कहानी है. पश्चिमी ओड़िशा में प्रचलित ‘बाली जगार’ को छोड़ दें तो धान को केंद्र में रखकर ऐसी लोकमहागाथा का उदाहरण देश में बहुत कम मिलता है.

गुरुमाय सुकदई कोराम द्वारा गाई जाने वाली कथा के अनुसार, लछमी यानी धान की माता का नाम मेंगइन रानी और पिता का नाम मेंग राजा है. यहां मेंग का अर्थ मेघ यानी वर्षा से है. मेंगइन रानी का विवाह बालिखंडपुर के राजा नरायन से होता है. राजा की पहले से ही 21 रानियां होती हैं. ये 21 रानियां वास्तव में दूसरी फसलों का प्रतीक हैं. इनमें कोदो, कोसरा, सांवा, मड़िया, हरवां, उड़द, मूंग, अरहर, सरसों, तिल और दूसरी दलहनी तथा तिलहनी फसलें शामिल हैं.

विवाह के बाद ये सभी रानियां लछमी को अपनी सौतन मानने लगती हैं और उन्हें तरह-तरह से परेशान करती हैं. उनका उद्देश्य लछमी को राजा का घर छोड़ने के लिए मजबूर करना होता है. इस दौरान कई पशु-पक्षी लछमी की मदद करते हैं, लेकिन अंततः 21 रानियां अपने षड्यंत्र में सफल हो जाती हैं. लछमी राजा नरायन का घर छोड़कर इंदरपुर चली जाती हैं. उनके साथ उनके अनुचर यानी बाकी जीव-जंतु और दूसरी सामग्री भी चली जाती है.

लछमी के जाते ही राजा नरायन के महल में अकाल जैसी स्थिति पैदा हो जाती है. घर में अन्न और दूसरी जरूरी चीजों की कमी होने लगती है. राजा अपनी 21 रानियों से मजदूरी करने के लिए कहते हैं, लेकिन उन्हें कहीं काम नहीं मिलता. तब राजा को अपनी गलती का एहसास होता है और वे लछमी को वापस लाने निकल पड़ते हैं.

कई कठिनाइयों के बाद राजा लछमी तक पहुंचते हैं. लछमी उन्हें बताती हैं कि उनकी सौतनों ने किस तरह उन्हें परेशान किया. राजा भविष्य में किसी तरह की परेशानी नहीं होने देने का वादा करते हैं और उनसे वापस लौटने की विनती करते हैं. अंततः लछमी मान जाती हैं. उनके वापस आते ही राजा का महल फिर से धन-धान्य से भर जाता है. 21 रानियां भी उनसे माफी मांगती हैं और भविष्य में परेशान नहीं करने का वादा करती हैं.

दूसरी कथा में बलराम को भी भुगतना पड़ता है परिणाम

खोरखोसा की गुरुमाय केलमनी द्वारा गाई जाने वाली ‘लछमी जगार’ की कथा भी इसी मूल कहानी से जुड़ी है, लेकिन इसमें बलराम की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. इस कथा के अनुसार, बलराम के कहने पर ही राजा नरायन लछमी का त्याग करते हैं. लछमी के महल छोड़ने के बाद केवल राजा ही नहीं, बल्कि उनके बड़े भाई बलराम को भी इसका परिणाम भुगतना पड़ता है.

लछमी के जाते ही नौखंडा राजमहल एक टूटी-फूटी झोपड़ी में बदल जाता है. घर में खाने के लिए अन्न नहीं बचता और कपड़े तक फट जाते हैं. यहां तक कि लछमी गुस्से में राजा नरायन और बलराम के पलंग भी उठवा लेती हैं और उनकी जगह श्मशान में फेंकी गई टूटी खाट रखवा देती हैं.

दोनों भाइयों को दर-दर भटकना पड़ता है. नौबत यहां तक पहुंचती है कि उन्हें भीख मांगनी पड़ती है, लेकिन भीख में मिली चीजें भी या तो हवा में उड़ जाती हैं या गायब हो जाती हैं. बलराम को स्वादिष्ट ककड़ी तक कड़वी लगने लगती है.

आखिरकार कई कठिन परीक्षाओं से गुजरने के बाद बलराम थक जाते हैं. वे राजा नरायन से लछमी को वापस लाने के लिए कहते हैं. राजा जब लछमी से विनती करते हैं, तब वे वापस आने को तैयार होती हैं. उनके लौटते ही राज्य में फिर से सुख-समृद्धि आ जाती है.

इन दोनों कथाओं का मूल संदेश यह है कि धान के बिना जीवन और समृद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती. लछमी का जाना अकाल और अभाव का प्रतीक है, जबकि उनका लौटना खुशहाली और अन्न की उपलब्धता का संकेत है.

लछमी जगार में धान के धरती पर आने की कहानी

‘लछमी जगार’ में केवल धान की महत्ता ही नहीं बताई गई है, बल्कि यह भी बताया गया है कि धरती पर धान कैसे आया. लोकगाथा के अनुसार, शुरुआत में धरती पर धान नहीं था. लोग कंद-मूल और पत्तियां खाकर अपना पेट भरते थे.

एक दिन पारबती रानी को अपने भाई कुबेर के पास मौजूद धान की याद आई. उन्होंने महादेव से कुबेर राजा के पास जाकर धान लाने को कहा. महादेव कुबेर से धान का बीज लेकर आए. इसके साथ ही उन्होंने पारबती के काका बड़ुंद राजा के घर से सोना और रुपा नाम के दो बैल भी लाए.

इसके बाद भिकंदर की मदद से जंगल का एक हिस्सा साफ किया गया और खेती के लिए जमीन तैयार की गई. बैलों से खेत जोते गए और उसमें धान बोया गया. कुछ समय बाद फसल पक गई. महादेव ने भिकंदर को धान काटकर लाने के लिए कहा. भिकंदर ने फसल काटकर कोठार में रख दी.

जब महादेव ने उससे पूछा कि कितनी फसल हुई है, तो उसने जवाब दिया- ढाई अंगवा. भिकंदर का शरीर बहुत बड़ा था, इसलिए उसके लिए यह मात्रा बहुत कम थी. लेकिन सामान्य मनुष्य के हिसाब से यह काफी अधिक धान था. महादेव इस बात को समझ नहीं पाए. उन्हें लगा कि इतनी मेहनत के बाद भी फसल बहुत कम हुई है. उन्होंने नाराज होकर भिकंदर को पूरी फसल जला देने का आदेश दे दिया.

भिकंदर ने महादेव की आज्ञा मानकर धान की खरही में आग लगा दी. आग से उठता धुआं ऊपरपुर तक पहुंच गया. इसे देखकर सभी देवी-देवता वहां दौड़े चले आए. महादेव भी उनके पीछे पहुंचे. सभी ने मिलकर आग बुझाई. जब कुबेर ने आग लगने का कारण पूछा तो महादेव ने पूरी घटना बताई.

इस आग में धान की फसल अलग-अलग मात्रा में जल गई थी. लोकगाथा के अनुसार, इसी वजह से धान की अलग-अलग किस्मों के नाम पड़े. जो धान सबसे ज्यादा जल गया था, उसे मेहर कहा गया. उससे थोड़ा कम जले धान को पखया नाम मिला. कुछ बेहतर स्थिति में बचे धान को बारंगी कहा गया. वहीं अच्छी स्थिति में बचे धान को चूड़ी, सफरी, टिकी चूड़ी, बासा भोग, राजा भोग, लोकटी माछी और तिल सकरी जैसे नाम मिले.

इसके बाद कुबेर राजा ने मर्त्यलोक यानी धरती के लोगों को बुलाकर बचा हुआ धान ले जाने के लिए कहा. इस तरह लोकमान्यता के अनुसार धान पूरी धरती पर फैल गया.

बस्तर में धान की पारंपरिक और आधुनिक किस्में

बस्तर में धान की खेती की परंपरा बहुत पुरानी रही है. यहां अलग-अलग जलवायु, जमीन और स्थानीय जरूरतों के अनुसार धान की अनेक किस्में विकसित और प्रचलित हुईं. इनमें कई ऐसी पारंपरिक किस्में हैं, जिनके नाम आज भी स्थानीय लोकजीवन और कृषि संस्कृति का हिस्सा हैं.

बस्तर में प्रचलित पारंपरिक धान की किस्मों में पखया, गाड़ाखुटा, मेहर, बासमती, बारंगी, चूड़ी, सफरी, टिकी-चूड़ी, बासा-भोग, राजा-भोग, लोकटी-माछी, तिलसकरी, बावंस-पती, तुलसी-माला, बोदा-बिजा, टेमरू-मुंडी, टांगन, पंडकी-गुड़ा, पोतोह, पिल कोरमेल, फूल मेछा, भाटा मोकड़ो, भाटा लुचई, भाटा खुजी, भाटा दुबराज, भाटा चूड़ी, भालू दुबराज, भागी, भैंस पाठ, भुरसी, मटको, मलको, मंछा, मारी चूड़ी, मोहा धान, मायट, मोकड़ो, मोतिलुर, माड़िया साटका, मुंदरिया, मद्रास चूड़ी, मछरी पोटी, अलटी बिजो, अलसांकर, आदन छिलपा, आसन चूड़ी, लायची, उमरी चूड़ी, लाल मोकड़ो, लाल बारंगी, लाल हजारी, लाहा गोयंदी, लोक्टी माछी, लायचा, बंडी धान, बयो, बयगनी, बंद परेवां, बड़े मोकड़ो, बायले ठगरी, बांडी लुचई, बांडी चूड़ी, बायको, बांस-गठी, बाक्टी चूड़ी, हरदी-गठी और हरदी चूड़ी शामिल हैं.

समय के साथ खेती में बदलाव आया और किसानों ने आधुनिक तथा उन्नत किस्मों को भी अपनाया. इनमें आईआर-36, एचएमटी, सीआर-310, डीआरआर-45, पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509 और पूसा-1610 जैसी किस्में शामिल हैं.

पकने के समय के आधार पर धान की तीन श्रेणियां

बस्तर में धान को पकने की समयावधि के आधार पर भी अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है. स्थानीय मान्यता और परंपरा में इसे ‘लछमी जगार’ की कथा से भी जोड़कर देखा जाता है.

पहली श्रेणी तुरिया धान की है. यह सबसे जल्दी पकने वाला धान है और लगभग 60 दिनों में तैयार हो जाता है. दूसरी श्रेणी मध्यम अवधि में पकने वाले धान की है. इसे मध्यम कहा जाता है और इसे तैयार होने में करीब 90 दिन लगते हैं. तीसरी श्रेणी माई धान की है, जो लगभग 120 दिनों में पकता है.

लोकमान्यता के अनुसार, धान की खरही में आग लगने के बाद जो धान ऊपर की ओर रह गए थे, वे 60 दिनों में पकने वाले हुए. बीच में रह गए धान 90 दिनों में और सबसे नीचे रह गए धान 120 दिनों में पकने वाले हुए. इस तरह धान की पकने की अवधि को भी लोकगाथा के माध्यम से समझाया जाता है.

औषधीय गुण, सुगंध और आकार से भी होती है पहचान

बस्तर में धान की किस्मों की पहचान केवल उनके नाम या पकने की अवधि से नहीं होती, बल्कि उनके गुणों, सुगंध और आकार के आधार पर भी की जाती है. कुछ धान औषधीय गुणों के लिए जाने जाते हैं, जबकि कुछ अपनी खुशबू के कारण विशेष पहचान रखते हैं.

औषधीय गुणों वाले धान में मेहर धान का प्रमुख स्थान है. इसके अलावा देव धान, लोकटी माछी धान, काला पारा धान और बांस पती धान को भी औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है.

आकार के आधार पर कुछ धान मोटे, कुछ पतले और कुछ मध्यम होते हैं. मसलन, बांस पती धान पतला होता है, जबकि गाड़ाखुटा मोटा और भाटा लुचई मध्यम आकार का होता है. बासा-भोग यानी बादशाह-भोग भी पतले धान की श्रेणी में आता है.

सुगंध के मामले में बासमती, दुबराज और बांस पती धान की विशेष पहचान है. वहीं लंबाई के आधार पर दुबराज को लंबा, गाड़ाखुटा और सफरी को मध्यम लंबाई का तथा बोदा-बिजा को छोटा धान माना जाता है.

उसना और अरवां चावल की परंपरा

बस्तर में धान से चावल तैयार करने की भी अलग-अलग परंपराएं हैं. धान को उबालने के बाद कूटकर जो चावल निकाला जाता है, उसे उसना चाउर कहा जाता है. वहीं बिना उबाले धान को कूटकर निकाले गए चावल को अरवां चाउर कहते हैं.

स्थानीय परंपरा में उसना चावल का संबंध उन परिवारों से भी रहा है, जिनके पास पुराना धान खत्म हो जाता था और उन्हें नया धान खाने के लिए इस्तेमाल करना पड़ता था. ऐसे परिवार नए धान को पहले उबालते थे और फिर उससे चावल निकालकर खाते थे. इस तरह उसना चावल गरीब परिवारों की जरूरत और भोजन की परंपरा से भी जुड़ा रहा है.

इसके अलावा कृषि से जुड़े चरू अनुष्ठान से पहले भी कुछ परिवारों में नए धान का सेवन करने की परंपरा रही है. जिनके पास पुराना धान नहीं होता था, वे नया धान उबालकर उसका चावल खाते थे.

स्थानीय वैद्य डायबिटीज के मरीजों को भी उसना चावल खाने की सलाह देते रहे हैं. इसके पीछे कुछ पारंपरिक मान्यताएं भी हैं. माना जाता है कि उसना चावल पकाने पर साबुत निकलता है और उसमें कनकी यानी टूटे हुए चावल की मात्रा नहीं होती. स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसके सेवन से सर्दी-खांसी की आशंका भी कम रहती है. यही वजह है कि नवप्रसूता महिलाओं को भी उसना चावल खिलाने की परंपरा रही है.

धान सिर्फ फसल नहीं, बस्तर की सांस्कृतिक पहचान भी है

बस्तर की धान संस्कृति को समझने के लिए केवल खेतों और फसलों को देखना पर्याप्त नहीं है. यहां धान लोकगाथाओं, धार्मिक मान्यताओं, पारंपरिक ज्ञान और खानपान का भी हिस्सा है. ‘लछमी जगार’ जैसी लोकमहागाथा में धान को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है. उसकी अनुपस्थिति को अकाल और गरीबी से, जबकि उसकी वापसी को सुख-समृद्धि से जोड़ा गया है.

धान की दर्जनों पारंपरिक किस्मों के नाम, उनके गुणों की पहचान, पकने की अवधि और उसना-अरवां चावल की परंपरा इस बात का प्रमाण हैं कि बस्तर के लोगों ने पीढ़ियों के अनुभव से धान को लेकर समृद्ध ज्ञान विकसित किया है.

आज खेती के तौर-तरीके बदल रहे हैं और आधुनिक किस्मों का चलन बढ़ रहा है, लेकिन बस्तर की यह पारंपरिक धान संस्कृति अपने भीतर इतिहास, लोकविश्वास और स्थानीय समाज के जीवन का एक बड़ा दस्तावेज समेटे हुए है. ‘लछमी जगार’ की कथा हमें याद दिलाती है कि धान यहां महज पेट भरने का साधन नहीं रहा, बल्कि जीवन और समृद्धि का प्रतीक रहा है. यही वजह है कि बस्तर की पहचान में धान और उसकी लोकगाथा का स्थान आज भी विशेष है.

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