बारूद के पार भी एक बस्तर है, जिसे अपनी कविताओं में रच रही हैं पूनम

छत्तीसगढ़ गाथा डेस्क.

बस्तर का नाम आते ही अक्सर नक्सलवाद, हिंसा और पिछड़ेपन की तस्वीर सामने आती है. लेकिन इस इलाके की एक दूसरी दुनिया भी है, जहां लोकगीत हैं, परंपराएं हैं, प्रकृति है और जीवन को देखने का एक अलग नजरिया है. बीजापुर की कवयित्री पूनम वासम अपनी कविताओं में इसी बस्तर को दर्ज कर रही हैं. उनकी कविताओं में आदिवासी समाज का जीवन, उसकी सांस्कृतिक विविधता और संघर्षों का दर्द एक साथ दिखाई देता है.

बस्तर को आमतौर पर किन शब्दों से पहचाना जाता है? नक्सलवाद, मुठभेड़, हिंसा, पिछड़ापन और सुरक्षा बलों की मौजूदगी. समाचारों में भी इस इलाके की चर्चा अक्सर इन्हीं संदर्भों में होती है. लेकिन क्या बस्तर की पहचान इतनी ही है?

बीजापुर की कवयित्री पूनम वासम की कविताएं इस सवाल के जवाब में बस्तर की एक दूसरी तस्वीर सामने रखती हैं. यह तस्वीर जंगलों, लोकगीतों, उत्सवों, परंपराओं और उन लोगों की है, जिनका जीवन प्रकृति के साथ गहरे जुड़ा हुआ है. इसमें आदिवासी समाज की सहजता और सामूहिकता है, तो उसके हिस्से आए संघर्षों और उपेक्षा का दर्द भी है.

पूनम की कविताओं की खासियत यह है कि वे बस्तर को बाहर से देखने के बजाय उसके भीतर रहकर लिखती हैं. वे उस समाज का हिस्सा हैं, जिसके बारे में लिख रही हैं. इसलिए उनकी कविताओं में बस्तर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक जीवंत समाज के रूप में सामने आता है.

बीजापुर जैसे अति संवेदनशील इलाके में रहते हुए राष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर अपनी जगह बनाना उनके लिए एक अलग उपलब्धि है. उनकी कविताएं देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. कविता संग्रह ‘मछलियां गाएंगी एक दिन पंडुम गीत’ ने उन्हें समकालीन हिंदी कविता में पहचान दिलाई है.

प्रेम कविताओं से शुरू हुआ लेखन का सफर

पूनम वासम का जन्म 1 जनवरी 1980 को जगदलपुर में हुआ. उनकी स्कूली शिक्षा महारानी लक्ष्मीबाई हायर सेकंडरी स्कूल में हुई. उन्होंने स्नातक के बाद समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की. उन्होंने ‘आत्मसमर्पित नक्सलियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन : बीजापुर जिले के विशेष संदर्भ में’ विषय पर अपना शोध कार्य भी पूरा किया है.

कविताएं लिखने की शुरुआत स्कूल के दिनों में ही हो गई थी. उस समय उनकी कविताओं का विषय प्रेम हुआ करता था. उनकी रचनाएं स्थानीय अखबारों में प्रकाशित होती थीं. बाद में आकंठ और सर्वनाम जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में भी उन्हें जगह मिली.

लेकिन वर्ष 2003 में शादी के बाद उनका लेखन रुक गया. पेशे से इंजीनियर शैलेश वासम से विवाह के बाद वे जगदलपुर से बीजापुर आ गईं. वर्तमान में वे बीजापुर में शासकीय शिक्षिका हैं.

करीब 11-12 वर्षों तक उन्होंने कोई कविता नहीं लिखी. फिर वर्ष 2016 में उन्होंने दोबारा लिखना शुरू किया. कुछ कविताएं लिखकर फेसबुक पर पोस्ट कीं. पाठकों की प्रतिक्रियाएं उत्साह बढ़ाने वाली थीं. इससे उन्हें लगा कि कविता से उनका रिश्ता अब भी बना हुआ है.

इसके बाद उन्होंने नियमित रूप से लिखना शुरू किया. हालांकि, उनके लेखन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव तब आया, जब पीएचडी के कोर्स वर्क के सिलसिले में उन्हें जगदलपुर में रहने का मौका मिला.

इस दौरान उन्होंने कई कवियों को पढ़ा. बस्तर और आदिवासी जीवन पर लिखी गई कविताओं से उनका परिचय हुआ. इसी क्रम में उन्होंने कवि चंद्रकांत देवताले की कविता ‘हाई कमान नंगे बस्तर को कपड़े पहनाएगा’ पढ़ी.

यह कविता उन्हें भीतर तक प्रभावित कर गई. उनके मन में सवाल उठा कि जिस जगह में वे रहती हैं, जिसे करीब से जानती और महसूस करती हैं, उस जगह के बारे में वे खुद क्यों नहीं लिख सकतीं?

यहीं से बस्तर उनकी कविताओं के केंद्र में आने लगा. उन्होंने तय किया कि वे यहां की संस्कृति, लोकजीवन और लोगों की आवाज को अपनी कविताओं में जगह देंगी.

बस्तर को देखने का नजरिया बदलने की कोशिश

पूनम मानती हैं कि बस्तर को लेकर देश में एक सीमित धारणा बनी हुई है. जब भी इस इलाके की चर्चा होती है, तो पिछड़ापन, हिंसा और अतिसंवेदनशीलता जैसे पहलू प्रमुखता से सामने आते हैं. जबकि बस्तर का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन इससे कहीं अधिक व्यापक है.

वे कहती हैं, ”बस्तर को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां हैं. बस्तर की जब भी बात होती है, पिछड़ापन, अतिसंवेदनशीलता, हिंसा जैसी नकारात्मक चीजें ही दिखाई-बताई जाती हैं. लेकिन बस्तर बदल रहा है. यहां के लोगों की सोच बदल रही है. स्थानीय लोगों ने हर क्षेत्र में खुद को स्थापित किया है और अपना मुकाम हासिल किया है.”

उनके मुताबिक, बस्तर की अपनी लोक संस्कृति, लोकरंग और लोक जीवन है. यहां के लोगों में सहजता, सरलता और निश्छलता है. लेकिन आदिवासी समाज को अक्सर मुख्यधारा की सभ्यता से अलग करके देखा जाता है.

पूनम का कहना है कि जब आदिवासी समाज की बात होती है, तो उसे एक अलग सभ्यता के रूप में किनारे कर दिया जाता है. उसके रहन-सहन, खान-पान, संस्कृति और लोकोत्सवों को देखने का नजरिया भी अक्सर नकारात्मक होता है. इस वजह से उस समाज की अच्छाइयां और जीवन की विशेषताएं सामने नहीं आ पातीं.

वे बस्तर की सांस्कृतिक विविधता का जिक्र करते हुए कहती हैं कि यहां हर पांच किलोमीटर पर बोलियां बदल जाती हैं. स्थानीय संस्कृति और लोक परंपराओं पर अभी बहुत काम किए जाने की जरूरत है.

उनके अनुसार, दुनिया को यह जानना चाहिए कि भारत में बस्तर जैसा एक अद्भुत क्षेत्र भी है, जहां केवल नक्सलवाद और बारूद नहीं है. यहां की संस्कृति, रहन-सहन और खान-पान की अपनी विशिष्टता है. यहां के लोकगीतों में जीवन की धड़कन सुनाई देती है.

बस्तर के लोगों के जीवन में मौजूद सामूहिकता और अनुशासन को समझाने के लिए पूनम एक दिलचस्प उदाहरण देती हैं.

वे बताती हैं कि बस्तर में महिलाएं, पुरुष और बच्चे सड़क पर चलते हुए भी अक्सर एक कतार में चलते हैं. सड़क खाली होने पर भी वे एक-दूसरे को पार करके आगे निकलने की कोशिश नहीं करते. वे एक-दूसरे के पीछे, एक लय में चलना पसंद करते हैं.

पूनम के लिए यह केवल चलने का तरीका नहीं है. यह उनके जीवन में मौजूद अनुशासन और सामूहिकता को समझने का एक तरीका है. वे मानती हैं कि इतने सहज और अनुशासित जीवन से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है.

बस्तर की प्रकृति और वहां के लोगों का जीवन भी उनकी कविताओं के महत्वपूर्ण संदर्भ हैं. यहां का जनजीवन काफी हद तक प्रकृति पर निर्भर है. सीमित संसाधनों के बावजूद लोगों के जीवन में एक खास तरह की खुशी दिखाई देती है.

पूनम चाहती हैं कि साहित्य में इस जीवन को भी जगह मिले. बस्तर को केवल हिंसा और नक्सलवाद के संदर्भ में देखने के बजाय उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पक्षों को समझने की जरूरत है.

‘मछलियां गाएंगी एक दिन पंडुम गीत’ से मिली पहचान

पूनम वासम का पहला कविता संग्रह ‘मछलियां गाएंगी एक दिन पंडुम गीत’ वर्ष 2021 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ. इस संग्रह में बस्तर के लोकजीवन, आदिवासी समाज, संस्कृति और उसकी संवेदनाओं की झलक मिलती है.

उनकी कविताएं देश की विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें वर्ष 2020 में पुनर्नवा पुरस्कार से सम्मानित किया. वर्ष 2022 में उन्हें अमर उजाला शब्द सम्मान भी मिला.

उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित साहित्यिक आयोजनों में कविता पाठ किया है. इनमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का युवा कवि संगम, लिटरेरिया कोलकाता, भारत भवन भोपाल, रजा फाउंडेशन दिल्ली, बिटिया उत्सव ग्वालियर और साहित्य अकादमी के दिल्ली, भोपाल तथा रायपुर के आयोजन शामिल हैं.

इसके अलावा ‘आज कविता’, ‘एक सांझ कविता की’, नीलांबर कोलकाता और श्रीकांत वर्मा सृजन पीठ बिलासपुर जैसे मंचों पर भी उन्होंने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की हैं. रजा फाउंडेशन के मंडला कविता पाठ में शामिल होने के साथ उन्होंने अरुण कोलटकर की कविताओं पर वक्तव्य भी दिया है. दूरदर्शन के प्रादेशिक कार्यक्रमों में भी वे कई बार कविता पाठ कर चुकी हैं.

20 नवंबर को वे आज तक के चर्चित कार्यक्रम ‘साहित्य आज तक’ में शामिल हुईं. बीजापुर जैसे इलाके से निकलकर राष्ट्रीय साहित्यिक मंचों तक पहुंचना उनके लेखन की स्वीकार्यता को दिखाता है.

पूनम को कविता से गहरा लगाव है. वे कहती हैं कि उनके भीतर सबसे पहले कविता ही उतरती है. गद्य लिखने से पहले भी उनके जेहन में कविता आती है.

उनके मुताबिक, कविता कम शब्दों में अपनी बात कहने का प्रभावी माध्यम है. लोग चलते-फिरते भी कविता पढ़ सकते हैं और वह आसानी से दिल में उतर जाती है. वे मानती हैं कि बस्तर के लोगों की आवाज देश-दुनिया तक पहुंचाने के लिए कविता एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकती है.

हालांकि, वे कहानी, उपन्यास और दूसरी गद्य विधाओं में भी लिखना चाहती हैं. लेकिन इसके लिए पहले बहुत कुछ पढ़ना, जानना और समझना चाहती हैं. उनका कहना है कि वे बस्तर में रहती हैं, जहां कहानियों की कोई कमी नहीं है. आने वाले समय में इन कहानियों को गद्य के माध्यम से भी सामने लाने की कोशिश करेंगी. फिलहाल उनका ध्यान कविता पर है.

उनका दूसरा कविता संग्रह भी जल्द प्रकाशित होने वाला है.

बस्तर की पहचान को लेकर बनी धारणाओं के बीच पूनम वासम की कविताएं एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह हैं. वे उस बस्तर की बात करती हैं, जिसकी चर्चा अक्सर खबरों में नहीं होती. उस बस्तर की, जहां लोकगीतों में जीवन है, परंपराओं में सामूहिकता है और प्रकृति के साथ जीने की अपनी एक समझ है.

उनकी कविताएं बस्तर के संघर्षों को नजरअंदाज नहीं करतीं, लेकिन उसकी पूरी पहचान को संघर्षों तक सीमित भी नहीं रखतीं. शायद इसी वजह से उनकी रचनाएं केवल कविता नहीं रह जातीं, बल्कि उस समाज को समझने का एक माध्यम बनती हैं, जिसे देश का बड़ा हिस्सा अब भी पूरी तरह नहीं जानता.

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