छत्तीसगढ़ की माटी को अपनी कविता में जीने वाले जनकवि केदार सिंह परिहार

छत्तीसगढ़ गाथा डेस्क.

‘छत्तीसगढ़ ल छांव करे बर मंय छानही बन जातेंव’… यह सिर्फ एक गीत की पंक्ति नहीं, बल्कि अपनी माटी के प्रति प्रेम और समर्पण की ऐसी अभिव्यक्ति है, जो समय के साथ छत्तीसगढ़ की पहचान का हिस्सा बन गई. इसके रचयिता केदार सिंह परिहार अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे शब्द आज भी लोगों की जुबान पर हैं.

केदार सिंह परिहार ने छत्तीसगढ़ को केवल एक भौगोलिक पहचान के रूप में नहीं देखा. उनके लिए यह खेतों की मिट्टी, गांव की पगडंडियों, किसानों के पसीने, लोकजीवन और यहां की संस्कृति से मिलकर बना एक जीवंत संसार था. उन्होंने इसी संसार को अपने गीतों में जगह दी. उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ के प्रति प्रेम किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि एक आत्मीय भावना की तरह सामने आता है.

31 अगस्त 2025 को उनका निधन हो गया. वे 73 वर्ष के थे. उनके जाने से छत्तीसगढ़ी साहित्य और लोकगीतों की दुनिया ने एक ऐसे रचनाकार को खो दिया, जिसने अपनी सहज भाषा और सरल अभिव्यक्ति से लोगों के दिलों में जगह बनाई. उनकी सबसे चर्चित रचना आज भी उनकी पहचान है. शायद यही किसी रचनाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि उसके जाने के बाद भी उसके शब्द लोगों के साथ बने रहें.

बचपन से ही कविता और गीतों से लगाव

केदार सिंह परिहार का जन्म 7 मार्च 1952 को मुंगेली जिले के पलानसरी गांव में एक किसान परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम भागवत सिंह परिहार और माता का नाम अंबिका सिंह परिहार था. उनका गांव केसतरा से करीब दो किलोमीटर दूर था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा नवागढ़ के पास स्थित गाड़ामोर गांव में हुई. आगे की पढ़ाई के लिए वे मुंगेली आए और एनएसजी कॉलेज से बीए किया. इसके बाद जांजगीर कॉलेज में एलएलबी की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर सके.

लेखन का बीज उनके भीतर बचपन में ही पड़ गया था. स्कूल के दिनों में वे दो-चार पंक्तियों की छोटी कविताएं लिखा करते थे. कॉलेज पहुंचने तक यह शौक एक रचनात्मक अभिव्यक्ति में बदलने लगा. उनके भीतर भाव आते और वे उन्हें कागज पर उतार देते.

साल 1972 में उन्होंने छत्तीसगढ़ के प्रति अपने लगाव को शब्द देते हुए वह गीत लिखा, जिसने आगे चलकर उन्हें प्रदेशभर में पहचान दिलाई.

‘मर के देव लोक झन जातेंव, कहूं जनम झन पातेंव,

छत्तीसगढ़ ल छांव करे बर मय छानही बन जातेंव.’

इस गीत में कवि की कल्पना का संसार बड़ा अनूठा है. वे मरने के बाद देवलोक जाने या कहीं और जन्म लेने की इच्छा नहीं रखते. वे चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ को छांव देने के लिए खुद छप्पर बन जाएं. अपनी माटी के लिए इससे अधिक आत्मीय अभिव्यक्ति शायद ही हो सकती है.

यही वह गीत था, जिसने उनकी साहित्यिक यात्रा को एक नई दिशा दी.

400 से अधिक रचनाएं, लेकिन अपना कोई संग्रह नहीं

केदार सिंह परिहार ने अपने जीवन में 400 से अधिक गीत और कविताएं लिखीं. हालांकि उनकी रचनाओं में गीतों की संख्या ज्यादा थी. वे खुद भी मानते थे कि गीत उनके दिल के ज्यादा करीब हैं. उनके भीतर ज्यादातर गीत ही जन्म लेते थे.

उनके गीतों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा की सहजता थी. उन्होंने ऐसी छत्तीसगढ़ी में लिखा, जिसे गांव का सामान्य व्यक्ति भी आसानी से समझ सके. उनके गीतों में खेत-खलिहान, किसान, गांव, रिश्ते, लोकजीवन और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान दिखाई देती है. यही वजह रही कि उनकी कई रचनाएं साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आम लोगों के बीच पहुंचकर जनगीत बन गईं.

रामायण और रामचरितमानस से भी वे गहरे प्रभावित थे. इसका असर उनकी रचनाओं में दिखाई देता है. उन्होंने बड़ी संख्या में धार्मिक गीत और कविताएं भी लिखीं.

उनकी रचनात्मक यात्रा को आगे बढ़ाने में साहित्यिक मंचों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. मुंगेली के पास ग्राम पुरान में आयोजित छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन में उन्हें पहली बार गीतकार के रूप में आमंत्रित किया गया था. इस आयोजन में पवन दीवान, दानेश्वर शर्मा और लक्ष्मण मस्तूरिया जैसे प्रतिष्ठित कवि और गीतकार मौजूद थे. उनके बीच अपनी रचनाएं सुनाने का अवसर केदार सिंह परिहार के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ. उनकी रचनाओं को सराहना मिली और आत्मविश्वास भी बढ़ा.

इसके बाद उन्हें प्रदेश के अलग-अलग साहित्यिक आयोजनों में बुलाया जाने लगा. धीरे-धीरे वे छत्तीसगढ़ी गीतों के लोकप्रिय रचनाकार बन गए.

दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी संख्या में रचनाएं लिखने के बावजूद उनका कोई कविता या गीत संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ. उन्होंने कभी इस दिशा में गंभीरता से प्रयास नहीं किया. वे अपनी रचनाएं डायरी में भी नियमित रूप से नहीं लिखते थे. जहां जगह मिली, कागज पर लिख दिया. इस लापरवाही के चलते उनकी कई रचनाएं समय के साथ खो भी गईं.

एक बातचीत में उन्होंने बताया था कि उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि अपनी रचनाओं का संग्रह प्रकाशित करवाना जरूरी है. हालांकि कोई दूसरा व्यक्ति उनकी रचनाओं का संग्रह प्रकाशित करना चाहे तो उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं थी.

फिल्मों के लिए भी लिखे गीत, कभी नहीं लिया पारिश्रमिक

केदार सिंह परिहार का लेखन केवल साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए भी गीत लिखे. ‘किसान-मितान’ और ‘इही हे राम कहानी’ उनकी ऐसी फिल्में हैं, जिनके सभी गीत उन्होंने लिखे थे.

‘किसान-मितान’ के निर्माता श्रीकांत सोनी मुंगेली के ही रहने वाले थे. उन्होंने परिहार से फिल्म के लिए गीत लिखने का आग्रह किया. परिहार ने यह जिम्मेदारी स्वीकार की और फिल्म के सभी गीत लिख दिए. इसके बदले उन्होंने कोई पारिश्रमिक नहीं लिया.

दरअसल, मंचों पर कविता और गीत सुनाने के लिए भी वे कभी पैसे नहीं लेते थे. चुनावों के दौरान भी उन्होंने कई गीत लिखे, लेकिन अपने लेखन के बदले किसी से आर्थिक लाभ लेने की कोशिश नहीं की. उनके लिए लेखन कमाई का जरिया नहीं, बल्कि अपनी भाषा और समाज से जुड़ने का माध्यम था.

उनकी रचनाओं को मिलने वाली लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 7 मार्च 2025 को छत्तीसगढ़ विधानसभा में तत्कालीन वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने बजट पर चर्चा के दौरान अपनी बात का समापन केदार सिंह परिहार की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों से किया था. विधानसभा की अधिकृत कार्यवाही में उनकी कविता का पाठ दर्ज है. यह उनके लेखन को मिली व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक स्वीकार्यता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है.

साहित्य के साथ राजनीति और सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय

केदार सिंह परिहार की पहचान केवल कवि और गीतकार की नहीं थी. वे सार्वजनिक जीवन और राजनीति में भी सक्रिय रहे. उन्होंने गांव के पंच और सरपंच के रूप में काम किया. वर्ष 1981 में वे ग्राम पंचायत टिंगीपुर के सरपंच चुने गए. लगातार दो पंचवर्षीय कार्यकाल तक इस जिम्मेदारी को निभाया.

इसी दौरान उन्हें कृषि उपज मंडी, मुंगेली का अध्यक्ष बनाया गया. वे मध्यप्रदेश मंडी बोर्ड के सदस्य भी नियुक्त किए गए.

वर्ष 1986 में उन्होंने बिलासपुर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव भी लड़ा था. हालांकि मतदान से ठीक एक दिन पहले अदालत ने चुनाव पर रोक लगा दी और बाद में यह चुनाव हो ही नहीं सका. उस समय उनके मुकाबले कांग्रेस के धर्मजीत सिंह मैदान में थे, जो वर्तमान में लोरमी से विधायक हैं. उस चुनाव में परिहार की जीत की संभावना मजबूत मानी जा रही थी. लेकिन चुनाव नहीं होने के कारण उनकी राजनीतिक यात्रा को एक अलग दिशा नहीं मिल सकी.

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी वे भाषा और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रहे. वर्ष 2008 से 2014 तक वे दो बार छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के सदस्य रहे. इस दौरान छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास और उसके व्याकरण निर्माण से जुड़े कामों में भी उन्होंने योगदान दिया.

वर्ष 2024 में उन्हें ‘छत्तीसगढ़ रत्न सम्मान’ से सम्मानित किया गया था. यह सम्मान उन्हें देसी टॉक कवि सम्मेलन के मंच पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने प्रदान किया था.

एक गीत, जो उनके जाने के बाद भी जीवित है

केदार सिंह परिहार का निधन 31 अगस्त 2025 को हुआ. उनके निधन पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उपमुख्यमंत्री अरुण साव सहित कई नेताओं और साहित्यप्रेमियों ने शोक व्यक्त किया. उनका अंतिम संस्कार उनके गृहग्राम केसतरा में किया गया.

उनके जीवन को देखें तो एक बात साफ नजर आती है. उन्होंने साहित्य को किसी पुरस्कार, पद या प्रकाशन तक सीमित नहीं रखा. न उन्होंने अपनी रचनाओं के संग्रह प्रकाशित कराने की चिंता की और न ही मंचों पर गीत सुनाने के बदले पारिश्रमिक लेने की. वे लिखते रहे, गाते रहे और अपनी भाषा के लोगों के बीच अपनी रचनाएं पहुंचाते रहे.

आज उनके लिखे सैकड़ों गीतों में से कई लोगों की स्मृति में हैं. लेकिन जिस गीत ने उन्हें पहचान दी, वह उनकी पूरी रचनात्मक सोच का सार भी है. छत्तीसगढ़ को छांव देने के लिए खुद छानी बन जाने की कल्पना दरअसल उस व्यक्ति की भावना है, जिसने अपनी माटी को सिर्फ जन्मभूमि नहीं, बल्कि अपना जीवन माना.

केदार सिंह परिहार अब नहीं हैं. उनकी कई रचनाएं शायद हमेशा के लिए खो गईं. उनके गीतों का कोई व्यवस्थित संग्रह भी उपलब्ध नहीं है. यह छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए एक ऐसी कमी है, जिस पर गंभीरता से ध्यान दिए जाने की जरूरत है.

किसी कवि की रचनाएं तभी सचमुच अमर होती हैं, जब वे किताबों से निकलकर लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाती हैं. केदार सिंह परिहार के साथ यही हुआ. उन्होंने छत्तीसगढ़ के लिए छानी बनने का सपना देखा था. उनके जाने के बाद उनके गीत ही उस सपने की छांव बनकर रह गए हैं.

————————————————————————————————–

यदि आपको हमारी कहानियां पसंद हैं और आप अपना कोई अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहते हैं तो हमें chhattisgarhgatha.com पर लिखें। आप हमें facebook, instagram व twitter पर भी फॉलो कर सकते हैं। किसी भी सकारात्मक व प्रेरणादायी खबर की जानकारी हमारे वाट्सएप नंबर 8827824668 या ईमेल chhattisgarhgatha07@gmail.com पर भी भेज सकते हैं।

1 Comment

  1. बहुत बढ़िया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *