छत्तीसगढ़ गाथा टीम.
छत्तीसगढ़ की फिल्म इंडस्ट्री में अब तक निर्देशन की कमान ज्यादातर पुरुषों के हाथों में रही है. ऐसे में पल्लवी शिल्पी की बतौर फिल्म निर्देशक एंट्री एक नई शुरुआत है. अभिनेत्री और रंगमंच निर्देशक के रूप में अपनी पहचान बना चुकीं पल्लवी अब एक ऐसी कहानी बड़े पर्दे पर लाने की तैयारी कर रही हैं, जिसका रिश्ता बस्तर के उन इलाकों से है, जिनकी चर्चा अक्सर नक्सलवाद और हिंसा के संदर्भ में होती है.
उनकी पहली फीचर फिल्म ‘अपनी-अपनी जमीन’ अबूझमाड़ के एक आदिवासी परिवार की कहानी है. यह परिवार नक्सल हिंसा और उससे पैदा हुई परिस्थितियों के बीच पलायन के लिए मजबूर होता है. फिल्म के जरिए पल्लवी बस्तर की एक ऐसी तस्वीर दिखाना चाहती हैं, जो आमतौर पर मुख्यधारा की फिल्मों और चर्चाओं में कम दिखाई देती है. इसमें आदिवासियों की मुश्किलों के साथ उनकी कला, संस्कृति, जीवनशैली और संगीत को भी जगह दी गई है.
फिल्म के पहले चरण की शूटिंग पूरी हो चुकी है. अब दूसरे चरण की शूटिंग की तैयारी है. करीब 90 मिनट की इस फिल्म को जनवरी-फरवरी तक रिलीज करने की योजना है. हालांकि, इससे पहले इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भेजने की तैयारी की जा रही है.
अबूझमाड़ के एक परिवार की कहानी, बड़े पर्दे पर
‘अपनी-अपनी जमीन’ का निर्माण निर्वाणोम फिल्म्स के बैनर तले किया जा रहा है. फिल्म के निर्माता विक्रांत झा हैं, जो राजनांदगांव के रहने वाले हैं. वे पिछले पांच वर्षों से फिल्म इंडस्ट्री में एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. इससे पहले वे एक फीचर फिल्म का निर्माण भी कर चुके हैं.
फिल्म में बॉलीवुड और छत्तीसगढ़ी सिनेमा के कई जाने-पहचाने चेहरे नजर आएंगे. मुख्य भूमिका में नलिनेश नील हैं, जो ‘द व्हाइट टाइगर’, ‘छिछोरे’, ‘गुलाबो सिताबो’, ‘रईस’ और ‘भोर’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं. उनके साथ संपा मंडल मुख्य भूमिका में हैं. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से प्रशिक्षित संपा ‘शेरनी’ और ‘सोनचिरैया’ जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुकी हैं.
इसके अलावा संजय बत्रा, सबर पराशर, सुभाष बंसोड, अभिषेक बाबा, अरुण भांगे, भवानी शंकर और शिवा कुमार जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं.
फिल्म में अबूझमाड़ के सात वर्षीय राजेश कोर्राम भी अभिनय करते नजर आएंगे. राजेश मलखंभ के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं. उन्होंने इस खेल में छत्तीसगढ़ को पहला गोल्ड मेडल दिलाया था. उनका परिवार नक्सली हिंसा से प्रभावित रहा है और फिलहाल नारायणपुर में रहता है. राजेश पोटा केबिन में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं.
फिल्म की खास बात यह है कि इसकी शूटिंग नारायणपुर के जंगलों में वास्तविक लोकेशन पर की गई है. पल्लवी का मानना है कि अबूझमाड़ की कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए वहां के परिवेश और परिस्थितियों को करीब से समझना जरूरी था. पहले चरण की शूटिंग के दौरान जिला और पुलिस प्रशासन का भी सहयोग मिला.
पल्लवी कहती हैं कि यह फिल्म किसी विचारधारा या ‘वाद’ से प्रभावित होकर नहीं बनाई जा रही है. उनकी कोशिश है कि घटनाओं और परिस्थितियों को उसी रूप में दिखाया जाए, जैसी वे हैं. फिल्म आज के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य से जुड़ी है, लेकिन यह किसी व्यक्ति विशेष की बायोपिक नहीं है.
वे कहती हैं कि फिल्म में बस्तर की समस्याओं के साथ वहां की कला और संस्कृति को भी दिखाने की कोशिश की गई है. आदिवासी संगीत फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसका इस्तेमाल इस तरह किया जा रहा है कि दर्शक कहानी के साथ-साथ बस्तर की सांस्कृतिक दुनिया से भी जुड़ सकें.

शॉर्ट फिल्म के विचार से शुरू हुई कहानी
पल्लवी बताती हैं कि ‘अपनी-अपनी जमीन’ की शुरुआत एक शॉर्ट फिल्म के विचार से हुई थी. उस समय वे एक दूसरी फिल्म पर काम कर रही थीं और उसके लिए निर्माता तथा प्रोडक्शन बैनर की तलाश में थीं. इसी दौरान उनके मन में एक ऐसी शॉर्ट फिल्म बनाने का विचार आया, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भेजा जा सके.
इसकी कहानी एक आदिवासी परिवार के इर्द-गिर्द थी. पल्लवी ने जब इस विषय पर शोध शुरू किया और लोगों से बातचीत की तो उन्हें लगा कि इस कहानी का दायरा शॉर्ट फिल्म तक सीमित नहीं होना चाहिए. इसके पीछे कई ऐसी परतें हैं, जिन्हें विस्तार से सामने लाने की जरूरत है.
यहीं से शॉर्ट फिल्म को फीचर फिल्म में बदलने का फैसला हुआ. कहानी को नए सिरे से तैयार किया गया. फिल्म की पटकथा पल्लवी और संगीता निगम ने मिलकर लिखी है.
पल्लवी के मुताबिक, यह एक कमर्शियल आर्ट फिल्म है. उनकी योजना है कि इसे पहले फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया जाए और इसके बाद मल्टीप्लेक्स तथा ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया जाए. उन्हें उम्मीद है कि फिल्म राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाएगी.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई से रंगमंच और सिनेमा तक का सफर
रायपुर में पली-बढ़ीं पल्लवी का फिल्म निर्देशन तक पहुंचने का सफर भी कम दिलचस्प नहीं है. उनकी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय में हुई. इसके बाद उन्होंने पॉलिटेक्निक की पढ़ाई की और भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की.
पढ़ाई पूरी करने के बाद छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल में उनकी असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर नौकरी भी लग गई थी. लेकिन उन्होंने नौकरी ज्वाइन नहीं की. वजह थी कला और रचनात्मक कामों के प्रति उनका झुकाव.
कॉलेज के दिनों से ही वे स्कल्पचर और पेंटिंग बनाने लगी थीं. इस दौरान उन्होंने कई प्रदर्शनियां लगाईं और अलग-अलग आर्ट कैंप में हिस्सा लिया. पढ़ाई के साथ ही उन्होंने व्यावसायिक रूप से कला के क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया था.
इसके बाद उन्होंने एनिमेशन फिल्म मेकिंग का कोर्स किया और रिलायंस मीडिया में एनिमेशन मॉडलर के रूप में काम किया. फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखने के लिए उन्होंने बालाजी टेलीफिल्म्स की आईसीई एकेडमी से फिल्म निर्देशन का कोर्स किया. इसके बाद कुछ टीवी सीरियल में सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया.
एक बुंदेलखंडी फिल्म में उन्होंने कला निर्देशन के साथ अभिनय भी किया. यह फिल्म कई फिल्म समारोहों में प्रदर्शित हुई और उसे पुरस्कार भी मिले.
धीरे-धीरे उनका रुझान रंगमंच की ओर बढ़ा. उन्होंने जयंत देशमुख, आलोक चटर्जी, अशोक मिश्र, शिवदास घोड़के, हीरा मानिकपुरी और योग मिश्र जैसे रंगमंच के निर्देशकों के साथ काम किया. इस अनुभव के बाद उन्होंने खुद नाटकों का निर्देशन शुरू किया.
पिछले पांच वर्षों से वे बच्चों को नाटक सिखा रही हैं. उनके निर्देशन में तैयार बच्चों के एक नाटक को राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिता में दूसरा पुरस्कार मिला है. उन्होंने कुछ शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्री भी बनाई हैं. जेल में महिला कैदियों के साथ एक महीने की नाट्य कार्यशाला आयोजित करना भी उनके अनुभवों में शामिल है.
उनका निर्देशित एडल्ट प्ले ‘रास बिहारी’ भी काफी चर्चा में रहा था.

बस्तर की कहानी को उसकी जमीन से दिखाने की कोशिश
पल्लवी के लिए ‘अपनी-अपनी जमीन’ महज एक फिल्म नहीं, बल्कि सिनेमा के जरिए एक ऐसे समाज की कहानी कहने का प्रयास है, जिसे अक्सर बाहरी नजरिए से देखा और समझा जाता है. अबूझमाड़ जैसे संवेदनशील इलाके में रहने वाले आदिवासी परिवारों की जिंदगी, उनके सामने मौजूद चुनौतियां और अपनी जमीन से उनका रिश्ता इस फिल्म के केंद्र में है.
छत्तीसगढ़ में महिला फिल्म निर्देशकों की मौजूदगी अभी सीमित है. ऐसे में पल्लवी का यह प्रयास फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं के लिए नए रास्ते खोल सकता है. हालांकि, किसी फिल्म की असली कसौटी उसका विषय नहीं, बल्कि उसे पर्दे पर पेश करने का तरीका और दर्शकों तक उसका पहुंचना होता है.
अब देखना होगा कि अबूझमाड़ के जंगलों से निकली यह कहानी जब बड़े पर्दे पर पहुंचेगी, तो दर्शकों को बस्तर का कौन-सा चेहरा दिखाएगी. क्या यह फिल्म नक्सलवाद और हिंसा से आगे बढ़कर उस बस्तर से भी परिचित करा पाएगी, जहां लोगों की अपनी जमीन, अपनी संस्कृति और अपनी जिंदगी से जुड़ी उम्मीदें हैं. ‘अपनी-अपनी जमीन’ की सबसे बड़ी चुनौती और संभावना भी यही है.
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