दिल्ली से अचानकमार आए एक प्रोफेसर, जिन्होंने बैगा आदिवासियों के बीच ही बिता दी पूरी जिंदगी

छत्तीसगढ़ गाथा डेस्क. 

दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफेसर प्रभुदत्त खेरा 1983 में अचानकमार के जंगलों में आए थे. मकसद था बैगा आदिवासियों के जीवन और उनकी संस्कृति को समझना. लेकिन यहां आकर उन्होंने जो देखा, उसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. वे महानगर नहीं लौटे और बैगा आदिवासियों के बीच ही बस गए. अगले 35 साल तक उन्होंने अपना जीवन उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक बेहतरी के लिए समर्पित कर दिया. आदिवासी उन्हें ‘दिल्ली वाले बाबा’ कहते थे. 23 सितंबर 2019 को जब उनका निधन हुआ तो वे अपनी संपत्ति भी उन्हीं बच्चों के नाम कर गए, जिनके बीच उन्होंने अपनी जिंदगी गुजारी थी.

एक शैक्षणिक यात्रा, जिसने बदल दी जिंदगी

प्रभुदत्त खेरा का जन्म 13 अप्रैल 1928 को अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई पंजाब के झंग में हुई, जो अब पाकिस्तान में है. देश के बंटवारे के समय उनका परिवार भारत आ गया.

उन्होंने 1948-49 में दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए किया. इसके बाद समाजशास्त्र में एमए और गणित में एमएससी की. उन्होंने एमलिब की पढ़ाई भी की और 1971 में दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की. इसी साल वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में रीडर नियुक्त हुए. इस दौरान उनके कई शोधपत्र प्रकाशित हुए. उन्होंने एनसीआरटीई में भी काम किया और कई शोधार्थियों को पीएचडी के लिए मार्गदर्शन दिया.

अध्यापन के साथ उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में घूमने और समाज को करीब से समझने का शौक था. वे मानते थे कि समाजशास्त्र केवल किताबों और कक्षाओं में पढ़कर नहीं सीखा जा सकता. इसके लिए समाज के बीच जाना और लोगों के जीवन को समझना जरूरी है.

इसी सोच के साथ 1983 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के विद्यार्थियों का एक दल लेकर अचानकमार टाइगर रिजर्व के लमनी गांव पहुंचे. इस शैक्षणिक यात्रा का उद्देश्य बैगा आदिवासियों के रहन-सहन, सामाजिक परिस्थितियों और उनकी संस्कृति का अध्ययन करना था. इस अध्ययन के आधार पर केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट भी सौंपी जानी थी.

लेकिन लमनी पहुंचकर प्रोफेसर खेरा ने बैगा आदिवासियों का जीवन जिस नजदीक से देखा, उसने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया. जंगल में रहने वाले इन लोगों की जीवनशैली, प्रकृति से उनका रिश्ता और उनकी सामाजिक परिस्थितियां उनके लिए अध्ययन का विषय भर नहीं रह गईं.

उन्होंने यहीं रुकने का फैसला कर लिया. साथ आए विद्यार्थियों को एक सप्ताह की छुट्टी का आवेदन देकर वापस भेज दिया. इसके बाद उन्होंने अपनी जिंदगी अचानकमार के जंगलों और यहां रहने वाले बैगा आदिवासियों के नाम कर दी.

बैगा बच्चों की शिक्षा को बनाया जीवन का उद्देश्य

लमनी में रहते हुए प्रोफेसर खेरा ने सबसे ज्यादा ध्यान बैगा बच्चों की शिक्षा पर दिया. वे जानते थे कि दूरदराज के जंगलों में रहने वाले बच्चों के लिए पढ़ाई तक पहुंचना आसान नहीं है. स्कूलों की कमी, शिक्षकों की अनुपस्थिति और सामाजिक परिस्थितियां उनकी शिक्षा में बड़ी बाधा थीं.

उन्होंने लमनी से करीब 18 किलोमीटर दूर छपरवा में एक हाईस्कूल के संचालन की जिम्मेदारी संभाली. यहां वे खुद अंग्रेजी पढ़ाते थे. स्कूल के संचालन और दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी पेंशन की राशि खर्च करते थे. यहां तक कि विद्यार्थियों के मिड डे मील का खर्च भी कई बार अपनी पेंशन से उठाते थे.

प्रोफेसर खेरा का मानना था कि आदिवासी इलाकों में शिक्षा की व्यवस्था स्थानीय समाज की जरूरतों और परिस्थितियों को समझकर ही बेहतर बनाई जा सकती है. बाहर से आने वाले शिक्षक अक्सर नियमित नहीं रहते और उन्हें स्थानीय भाषा, बच्चों की पृष्ठभूमि तथा परिवेश की पर्याप्त जानकारी भी नहीं होती.

इसलिए उन्होंने स्थानीय बच्चों को पढ़ाकर शिक्षक बनाने पर जोर दिया. आज इस स्कूल में पढ़े तीन विद्यार्थी खुद शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. उनके लिए यह केवल रोजगार का अवसर नहीं, बल्कि अपने ही समाज के बच्चों को शिक्षित करने का माध्यम है.

स्कूल के बेहतर संचालन के लिए उन्होंने 2014 में अभयारण्य शिक्षण समिति का गठन किया. इसी समिति के माध्यम से स्कूल का संचालन किया जाने लगा.

प्रोफेसर खेरा की चिंता केवल शिक्षा तक सीमित नहीं थी. वे बैगा आदिवासियों के स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता और भविष्य को लेकर भी लगातार सक्रिय रहे. अचानकमार टाइगर रिजर्व होने के कारण बैगा आदिवासियों के विस्थापन का सवाल उन्हें परेशान करता था. वे इस मुद्दे पर सरकार को पत्र लिखते रहते थे.

उनका मानना था कि जंगल और आदिवासी समाज को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता. जंगल उनके जीवन, आजीविका और संस्कृति का आधार है. इसलिए विकास और संरक्षण की योजनाएं बनाते समय आदिवासियों के अधिकारों और उनकी जीवनशैली का ध्यान रखना जरूरी है.

सम्मान से ज्यादा जरूरी था बच्चों का भविष्य

प्रोफेसर खेरा का जीवन बेहद सादगी भरा था. लमनी में वे एक कच्चे मकान में रहते थे. उनके पास जरूरत का बहुत कम सामान था, लेकिन किताबें खूब थीं. उनके बिस्तर का आधा हिस्सा किताबों से भरा रहता था और आधे हिस्से में वे सोते थे.

वे रोज सुबह बस से छपरवा स्थित स्कूल जाते और शाम को उसी बस से लमनी लौट आते थे. गांधीवादी विचारों से प्रभावित होने के कारण हमेशा खादी के कपड़े पहनते थे. कंधे पर एक झोला लटकाए रखना उनकी पहचान बन गई थी.

उस झोले में बच्चों के लिए बिस्किट और टॉफियां रहती थीं. स्कूल से लौटने के बाद वे अक्सर लमनी नाका के पास बैठते और बच्चों को खाने-पीने की चीजें बांटते थे. उनके पास सुई-धागा भी रहता था. बैगा बच्चों के कपड़े फटे होते तो वे खुद ही उनकी सिलाई कर देते थे.

बच्चों के प्रति उनका यह लगाव केवल दुलार तक सीमित नहीं था. वे चाहते थे कि जंगल में रहने वाले इन बच्चों को भी शिक्षा और बेहतर जीवन के अवसर मिलें.

प्रोफेसर खेरा को सम्मान और पुरस्कारों में विशेष रुचि नहीं थी. उनका मानना था कि वे यह काम किसी पुरस्कार या वाहवाही के लिए नहीं कर रहे हैं. हालांकि, काफी आग्रह के बाद उन्होंने 2017 में छत्तीसगढ़ सरकार का पहला गांधी स्मृति सम्मान स्वीकार किया.

इस सम्मान के साथ मिली पांच लाख रुपये की राशि भी उन्होंने अपने पास नहीं रखी. पूरी रकम बैगा बच्चों के कल्याण के लिए अभयारण्य शिक्षण समिति को सौंप दी.

इस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने छपरवा में संचालित स्कूल के शासकीयकरण की घोषणा की थी. स्कूल के विस्तार के लिए राज्य सरकार की ओर से 20 लाख रुपये भी दिए गए. बाद में स्कूल के सात शिक्षकों को स्थायी किया गया.

लमनी में लगी प्रो. खेरा की प्रतिमा

जंगल के लोगों से सीखने को कहते थे

प्रोफेसर खेरा की सोच में आदिवासी समाज केवल अध्ययन का विषय नहीं था. वे मानते थे कि जंगल में रहने वाले लोगों के पास प्रकृति, वनौषधियों और मिट्टी के बारे में ऐसा ज्ञान है, जिसे आधुनिक समाज को समझने की जरूरत है.

वे कहते थे, “वनवासियों से हमें सीखना चाहिए. वन, वनौषधियों और मिट्टी को लेकर जितना वनवासी जानते हैं, उतना ज्ञान किसी के पास नहीं है.”

आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने के नाम पर उनकी मूल संस्कृति और जीवनशैली में बदलाव करने की कोशिशों पर भी वे सवाल उठाते थे. उनका मानना था कि आदिवासी समाज को उसकी अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए.

वे कहते थे, “हम अनेकता में एकता की बात जब करते हैं तो फिर वनवासियों को उनके मूल स्वरूप में क्यों नहीं छोड़ना चाहते? उन्हें उजाड़ने की नहीं, उनसे सीखने की जरूरत है.”

उनके लिए जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं था. वह एक ऐसी दुनिया थी, जहां जीवन की अपनी व्यवस्था, अपने मूल्य और प्रकृति के साथ जीने का अपना तरीका था. वे मानते थे कि बैगा आदिवासी जंगल में रहकर उसे संरक्षित भी रखते हैं. उनकी जरूरतें सीमित हैं और वे कम संसाधनों में भी संतोष के साथ जीवन जीते हैं.

एक बार उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा था, “आप सामाजिक विज्ञान कक्षा के अंदर नहीं पढ़ा सकते और मैं भी यहां कोई समाज सेवा करने नहीं आया हूं, बल्कि मैं इस बैगा आदिवासी समाज से बहुत कुछ निरंतर सीख रहा हूं. यहां आकर मेरा पुनर्जन्म हुआ है.”

यह बात उनके जीवन को समझने के लिए काफी है. वे आदिवासियों के बीच किसी उद्धारकर्ता की तरह नहीं आए थे. वे उनके साथ रहकर उनके जीवन को समझना और उनसे सीखना चाहते थे.

इस छोटे से कच्चे घर में रहते थे प्रोफेसर खेरा

अंतिम सांस तक बैगा बच्चों की चिंता

प्रोफेसर खेरा का जीवन जितना सादा था, उनकी विद्वता उतनी ही व्यापक थी. पंजाब में पले-बढ़े होने के कारण उन्हें गुरुमुखी और उर्दू का अच्छा ज्ञान था. वे फारसी में भी पारंगत थे. शास्त्रीय परंपराओं की गहरी समझ रखते थे और उन पर घंटों चर्चा कर सकते थे.

विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान भी वे किताबी ज्ञान से अधिक फील्डवर्क को महत्व देते थे. देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्राओं में स्थानीय लोगों की कहानियां जुटाते और अपनी कक्षाओं में विद्यार्थियों को सुनाते थे. उन्होंने अपने अनुभवों को किसी किताब में दर्ज नहीं किया. उनके लिए समाज को समझना ही सबसे बड़ा उद्देश्य था.

लंबी बीमारी के बाद 23 सितंबर 2019 को बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में उनका निधन हो गया. उनके जाने से अचानकमार के बैगा आदिवासी समाज ने अपना एक ऐसा साथी खो दिया था, जिसने अपना पूरा जीवन उनके बीच बिताया.

एक कमरे में रखा प्रोफेसर खेरा का सामान

प्रोफेसर खेरा ने अपनी संपत्ति बैगा आदिवासी बच्चों के नाम कर दी थी. इसमें उनकी करीब 42 लाख रुपये की संचित निधि, पूरी पेंशन और पुरस्कारों से मिली राशि शामिल थी. अपनी अंतिम इच्छा में उन्होंने यह भी कहा था कि इस रकम में से एक लाख रुपये किसी गुरुद्वारे में लंगर करवाने के लिए दिए जाएं.

उनकी मृत्यु के बाद लमनी स्थित उनके कच्चे मकान से सामान हटाकर रेस्ट हाउस के पास एक पक्के कमरे में रख दिया गया. उनके पास कोई बड़ी संपत्ति या भौतिक सुख-सुविधाएं नहीं थीं. उनका पूरा सामान सात-आठ बोरियों में समा गया था.

इन बोरियों में दो बोरियां किताबों और डायरियों की थीं. बाकी सामान में उनके कपड़े, छाता, खाना बनाने का स्टोव, चटाई, बाल्टियां, गिलास और दवाइयों की शीशियां थीं. उनके कुछ सम्मान पत्र और राशन कार्ड भी वहीं रखे थे. राशन कार्ड बताता था कि वे हर महीने सरकारी राशन से मिलने वाले चावल, नमक और मिट्टी के तेल के सहारे जीवन बिताते थे.

जिस व्यक्ति ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया, शोध किया और अपना पूरा जीवन बैगा समाज के लिए लगा दिया, उसके जाने के बाद उसकी दुनिया कुछ किताबों, डायरियों और रोजमर्रा के सामान में सिमट गई.

लेकिन प्रोफेसर प्रभुदत्त खेरा की असली विरासत उस कमरे में बंद सामान नहीं है. वह छपरवा के उस स्कूल में है, जहां आज भी बच्चे पढ़ रहे हैं. उन तीन स्थानीय शिक्षकों में है, जो कभी इसी स्कूल में विद्यार्थी हुआ करते थे. उन बच्चों में है, जिन्हें उन्होंने शिक्षा का महत्व समझाया और उन परिवारों में है, जिन्होंने उन्हें अपने बीच का मान लिया था.

आदिवासी उन्हें ‘दिल्ली वाले बाबा’ कहते थे. यह नाम उनके लिए किसी पद या सम्मान से बड़ा था. उन्होंने अपनी जिंदगी के 35 साल जंगल में बिताए, लेकिन कभी खुद को वहां का बाहरी व्यक्ति नहीं माना.

वे दिल्ली से अचानकमार आए थे, बैगा समाज को समझने के लिए. लेकिन धीरे-धीरे यह समाज ही उनका परिवार बन गया. उन्होंने न केवल बैगा आदिवासियों के बीच जीवन बिताया, बल्कि अपनी अंतिम पूंजी भी उनके बच्चों के भविष्य के नाम कर दी.

प्रोफेसर खेरा के जाने के बाद अचानकमार के जंगल में एक व्यक्ति जरूर कम हो गया, लेकिन उनके काम और विचारों में आज भी ‘दिल्ली वाले बाबा’ जीवित हैं.

————————————————————————————————–

यदि आपको हमारी कहानियां पसंद हैं और आप अपना कोई अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहते हैं तो हमें chhattisgarhgatha.com पर लिखें। आप हमें facebook, instagram व twitter पर भी फॉलो कर सकते हैं। किसी भी सकारात्मक व प्रेरणादायी खबर की जानकारी हमारे वाट्सएप नंबर 8827824668 या ईमेल chhattisgarhgatha07@gmail.com पर भी भेज सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *