छत्तीसगढ़ गाथा डेस्क/
‘मैं आज 68 साल की हो गई हूं. जब छोटी थी तब लड़कियों के लिए गाना-बजाना बहुत मुश्किल था. तब मैंने पंडवानी को गले लगाया क्योंकि मेरी हिम्मत बहुत बड़ी थी. मैंने ठान लिया था कि मुझे करना है मतलब करना है. दुनिया ने लाख ताने मारे, घर से निकाल दी गई, लेकिन मैं कभी हिम्मत नहीं हारी. मैं पढ़ी-लिखी नहीं थी. इसलिए कोई क्या बोलता है, मुझे फर्क नहीं पड़ता था. मैंने वही किया जो मुझे करना था, तभी आगे बढ़ पाई. दुनिया की सोचती तो कभी यहां तक नहीं पहुंच पाती है’. यह कहना है, पद्मविभूषण डॉ. तीजन बाई का. वे पांच दशकों से सारी दुनिया को पंडवानी सुना रही हैं.
तीजन का जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग दिले के अटारी गांव में हुआ, लेकिन उनका लालन-पालन उनके ननिहाल भिलाई से लगे गांव गनियारी में हुआ. वे बताती हैं, उनके नाना बृजलाल पारधी की दो बेटियां थीं, जिनमें उनकी मां सुखवती बड़ी थीं. नाना बुजुर्ग हो गए तो मां उनकी देखभाल के लिए अपने मायके गनियारी आ गईं. तीजन यहीं पली-बढ़ी और यहीं से पंडवानी का सिलसिला शुरू हुआ.
नाना थे तीजन के गुरु
नाना ही तीजन के पंडवानी गुरु थे. तीजन को बाकायदा उन्होंने पाठपीढ़ा यानी दीक्षा दी है. तीजन बताती हैं कि उनके नाना पास के ही एक गांव में पंडवानी सुनने जाया करते थे. फिर घर आकर वे उसी कथा को लोगों को सुनाते. नाना बहुत अच्छी कथा सुनाते थे. उनके पास तंबूरा और खंजरी थी, उसे बजाते और कथा सुनाते. एक दिन वे द्रोपदी प्रसंग सुना रहे थे, तीजन को कथा अच्छी लगी. वे रोज छुप-छुप कर कथा सुनने लगीं. एक दिन नाना ने तीजन को दीवार की ओट से कथा सुनते हुए देख लिया. पूछा कबसे सुन रही हो? डरते डरते तीजन ने बताया कि सप्ताहभर से. नाना गुस्सा नहीं हुए. उन्होंने पूछा, क्या तुम्हें कथा अच्छी लगती है. तीजन ने कहा- हां. नाना ने पूछा- जो सुना है, उसमें से कुछ सुना सकती हो? तीजन ने जो सुना था, सुना दिया. नाना आश्चर्यचकित थे कि 12-13 साल की बालिका को कथा हू-ब-हू कैसे याद है. इसके बाद तीजन रोजाना नाना के पास कथा सुनने आने लगीं. वे शाम को कथा सुनतीं तो रातभर सो नहीं पातीं. उन्हें सपनों में कथा सुनाई देती. तीजन अगले दिन वही कथा नाना को गाकर सुनातीं. नाना पूछते तुमने कहा से सीखा? तीजन बतातीं कि सपने में. नाना समझ चुके थे कि तीजन कोई साधारण बच्ची नहीं है. उनके अंदर ईश्वरीय गुण हैं. नाना ने तीजन को दीक्षा दी और कहा- कुछ भी हो जाए, पंडवानी को छोड़ना मत. तीजन ने भी नाना को वचन दिया कि वे पंडवानी को कभी नहीं छोड़ेंगी. जब तक उनके प्राण रहेंगे, यह प्रण रहेगा.
दीक्षा के बाद भेंट किया तंबूरा
तीजन को दीक्षा देने के साथ ही उनके गुरु और नाना बृजलाल ने उन्हें अपना एकतारा यानी तंबूरा भी भेंट किया. उन्होंने बताया कि इस तंबूरे में तीन देवी-देवताओं का वास है. ऊपर लगा मोरपंख भगवान श्री कृष्ण का प्रतीक है. तार मां सरस्वती का और सबको निकाल दिया जाए तो यह हनुमान की गदा बन जाती है. इस बात को कोई माने या न माने पर मैं मानता हूं, जो तुम्हें बता रहा हूं. यह कोई साधारण चीज नहीं है. तीजन कहती हैं- तंबूरे के बिना मेरे मुंह से आवाज ही नहीं फूटती, लेकिन जैसे ही तंबूरा हाथ में आता है, पता नहीं कहां से अंदर शक्ति आ जाती है.
साइकिल के स्पोक से बजाती हैं तंबूरा
तीजन साइकल के स्पोक से तंबूरा बजाती हैं. वे बताती हैं कि नाना जी ने उन्हें जो तंबूरा दिया था, उसमें एक तार था. तीजन को वह बजाना नहीं आता था. उन्होंने नाना से कहा कि अगर इसमें तीन तार हो जाएं तो वे उसे बजा लेंगी. नाना ने उन्हें इजाजत दे दी. एक बार तीजन अपनी नानी के साथ रायपुर गई थीं, वहां उन्हें तंबूरे का तार दिख गया. उन्होंने रो-रो कर नानी से 2 रुपए मांगे और आठ बंडल तार ले आई। खुद तंबूरे में छेद कर तीन तारों को जोड़ा. लेकिन दिक्कत थी कि बजाया किससे जाए. लकड़ी से बजातीं तो वह टूट जाती. वे गांव के ही एक साइकिल दुकान वाले के पास गईं और वहां से स्पोक मांग लाईं. उसे उंगली में फिट होने के लायक गोल मोड़ा और उससे तंबूरे के तार छेड़े. तंबूरा बोल उठा. वे आज भी साइकिल के स्पोक से ही तंबूरा बजाती हैं.
पंडवानी सुनाई तो पड़ा गाल पर तमाचा
तीजन एक और मजेदार किस्सा सुनाती हैं- नाना ने दीक्षा दी तो पांच पद सुनाने बोले. तीजन ने कीचक वध का प्रसंग सुनाना शुरू किया. शाम का वक्त था. चिमनी के प्रकाश में तीजन प्रसंग सुना रही थीं. प्रसंग के अंत में भीम कीचक को मारने के लिए हाथ उठाते हैं. तीजन ने जैसे ही हाथ उठाया उनके गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा. एक बारगी लगा कि कहीं उन्होंने खुद को तो तमाचा नहीं मार लिया, लेकिन अगले ही पल मां की गालियां सुनाई दीं तो अहसास हो गया कि ये उनकी मां हैं जो उनकी पंडवानी के बिल्कुल ही खिलाफ थीं.
मां ने घर से निकाल दिया
तीजन बताती हैं, पंडवानी के कारण उन्हें बचपन में बहुत तकलीफ सहनी पड़ी. लोग तरह-तरह के ताने मारते थे. उनकी मां को भी ताने सुनने पड़ते थे. लोग कहते थे- जैसी मां वैसी बेटी. लोगों के तानों से परेशान होकर उनकी मां उन्हें खूब पीटतीं. कई बार कमरे में बंद कर देतीं. दिन-दिनभर भूखा रखतीं. कहतीं- तेरे कारण लोगों की बातें सुननी पड़ती हैं. तू ये छोड़ क्यों नहीं देती? तीजन कोई जवाब नहीं देतीं. मार का भी कोई असर नहीं पड़ता. मार की पीड़ा को आंसुओं में बहाकर वे फिर पंडवानी गाने लगतीं. तंग आकर एक दिन मां ने उन्हें घर से निकाल दिया. तीजन के पास रहने का कोई ठौर नहीं था. उन्होंने घर के पास ही एक झोपड़ी बनाई और उसी में रहने लगीं. वे बताती हैं कि उनकी मां लोगों की बात सुनकर उन्हें बहुत मारती थीं, लेकिन पिता हुनुकलाल कभी एक शब्द नहीं बोलते थे. मां बहुत कड़क थीं, लेकिन पिता बहुत नरम दिल थे.
पंडवानी सुनने मजदूरों ने खाना छोड़ दिया
तीजन का जन्म पारधी जनजाति में हुआ था. इस जनजाति का मुख्य पेशा बहेलिये का है, यानी पक्षियों का शिकार और बेचने का. तीजन का परिवार तीतर, बटेर, पड़की, घाघर पकड़कर अपना जीवन चलाता था. बाद में सरकार ने इस काम को अवैध घोषित कर दिया. इसके बाद वे लोग छीन के पत्ते से झाडू, चटाई बनाने का काम करने लगे. तीजन बताती हैं, घर से निकाले जाने के बाद वे अकेली ही रहती थीं. एक दिन गांव के कुछ लोग छीन पत्ती काटने पास के गांव चंदखुरी जा रहे थे. लोग परिचित थे, इसलिए तीजन भी उनके साथ चल दीं. वे उनके साथ वहां छीन पत्ती काटतीं और झाड़ू, चटाई बनाने हुए पंडवानी गातीं. पास में एक स्कूल था, जहां मरम्मत का काम चल रहा था. काम करने वाले मजदूरों ने तीजन को गाते हुए सुना. उनकी आवाज मंत्रमुग्ध कर देने वाली थी. मजदूर पहले दोपहर में खाना खाने अपने घर जाया करते थे, लेकिन तीजन की पंडवानी सुनने की ललक में उन्होंने दोपहर को घर जाना छोड़ दिया.
तीजन को सुनने दूर दूर से लोग आए बैलगाड़ियां रखने तालाब समतल करना पड़ा…
एक दिन गांव के दाऊ स्कूल का काम देखने पहुंचे. उन्होंने मजदूरों से पूछा- खाना खाने घर नहीं गए? मजदूरों ने बताया कि स्कूल के पीछे एक लड़की बहुत सुंदर पंडवानी गाती है. उसे सुनने के लिए वे लोग घर नहीं जाते. दाऊ ने पूछा- क्या वो इतना अच्छा गाती है ? मजदूरों ने कहा आप आज खुद ही सुन लीजिए, थोड़ी ही देर में उसका गाना शुरू होने वाला है. उस दिन दाऊ ने तीजन को गाते हुए सुना. वे स्कूल के पीछे पहुंचे, पूछा- गाना कौन गा रहा था? सब लड़कियां एक-दूसरे की ओर इशारा करने लगीं. समूह के मुखिया ने बताया कि वह सांवली सी लड़की गाती है, तीजन नाम है उसका. दाऊ ने खुश होकर तीजन को दस रुपए दिए. तीजन की खुशी का ठिकाना न रहा. शाम को दाऊ ने एक टोकरी राशन का सामान तीजन और उसके साथियों को भिजवाया. साथ ही तीजन को गांव के शक्ति चौरा में पंडवानी गाने का न्योता भी भेजा. तीजन ने पहले तो गाने से इनकार किया दिया, लेकिन फिर अपने मुखिया के कहने पर वो मान गईं.
तीजन जब शक्ति चौरा पहुंचीं तो देखा कि वहां सोलापुरी चद्दर का पंडाल सजा हुआ है. रोशनी के लिए चारों कोनों पर कंडील लटक रही हैं और सामने बच्चों की भीड़ इकट्ठा है. वहीं हारमोनियम और तबला भी ऱखा हुआ था. तीजन ने पूछा- यह क्या है? बताया गया कि यह पेटी और तबला है जिसके साथ तुम्हें गाना है. तीजन ने कभी पेटी तबला के साथ नहीं गाया था. उन्होंने बाजे के साथ गाने से साफ इनकार कर दिया और वहां से चली गईं. दाऊजी तीजन को समझाने पहुंचे. उन्होंने तीजन से कहा, तुम जैसा गाती हो वैसा गाना. वे तुम्हारे साथ बजा पाएंगे तो बजाएंगे वरना उन्हें भगा देंगे. दाऊ ने ऐसा तीजन को मनाने के लिए कहा, लेकिन तीजन जब मंच पर पहुंचीं और हारमोनियम, तबले के साथ गाना शुरू किया तो गाते ही रह गईं. वे कहती हैं- गाते हुए लगा जैसे तलबा-हारमोनियम उनके पूर्व जन्म के साथी हों. तीजन को सुनने पूरा गांव उमड़ पड़ा. शक्तिचौरा में तीन दिन कार्यक्रम होना था, पहले दो दिन इतनी भीड़ उमड़ी कि तीसरे दिन का कार्यक्रम महादेव मंदिर परिसर स्थित गोमती दास में हुआ जो ज्यादा बड़ी जगह थी. वहां कथा कुल 18 दिनों तक चली. दूर-दूर से लोग तीजन की पंडवानी सुनने बैलगाड़ियों में आए. बैलगाड़ियों को रखने के लिए एक पूरे सूखे तालाब को समतल करना पड़ा. तीजन का यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था. यह 1971 की बात है.
तब गाने के बदले पैसे नहीं नारियल मिलता था..
चंदखुरी में अपना पहला सार्वजनिक कार्यक्रम देने के बाद तीजन अपने गांव गनियारी पहुंचीं. साथ में दो बैलगाड़ी भर सामान था. समस्या यह थी कि इस सामान को रखें कहां. उन्होंने सामान झोपड़ी के सामने उतरवाकर बैलगाड़ियों को रवाना कर दिया. घर के सामने रहने वाली एक सहेली ने कहा कि जो धान मिला है उसमें से आधा बेचकर मकान बना लो। तीजन ने उसे ही मकान बनाने का ठेका दे दिया. कुछ दिनों में दो कमरे का घर बनकर तैयार हो गया. एक कमरे में तीजन खुद रहने लगीं और दूसरे में सारा सामान रखा दिया. जिस कमरे में रहती थीं, उसी में उनकी रसोई भी बनने लगी. तीजन नाम तो कमाने लगी थीं, लेकिन जीवन केवल नाम से तो नहीं चलता न. उनकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. तब पंडवानी गाने के पैसे भी नहीं मिलते थे. विदाई के समय लोग नारियल देते थे. बाद में चढ़ावे का रिवाज चला, लेकिन चढ़ावे वाली रात बहुत कम लोग आते. इसलिए चढ़ावा भी कम ही मिलता. तीजन बताती हैं, बाद में सवा रुपए, ग्यारह, इक्कीस और इक्यावन रुपया परिश्रमिक पर गायन शुरू हुआ. उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी. लोगों में उनकी पंडवानी के लिए दीवानगी थी. लोग दूर-दूर से पंडवानी सुनने बैलगाड़ियों में आते. तीजन के मुताबिक, उन्होंने 18-18 दिनों के तीन प्रोग्राम दिए. इसके बाद इतनी ज्यादा डिमांड बढ़ने लगी कि किसी एक जगह पर 18 दिनों का कार्यक्रम करना मुश्किल होने लगा. हर कोई चाहता था, उनके गांव में तीजन की पंडवानी हो. तीजन ने भी कभी किसी को निराश नहीं किया. बारिश में भीगते हुए, दुधमुंहे को गोद में उठाए और कभी मंच के पीछे बच्चे को दूध पिलाकर फिर मंच पर आ जातीं. तेज बुखार में भी उन्होंने कभी न्योता नहीं छोड़ा.
झाड़ूराम बोले- भिलाई में उनका पता कोई भी बता देगा
1976 में तीजन को पहली बार शहरी मंच मिला. भिलाई स्टील प्लांट के लोकोत्सव में उन्होंने ऐसा समा बांधा कि इस कार्यक्रम ने उनकी जिंदगी में स्टार लोकप्रियता के दरवाजे खोल दिए. वे तेजी के साथ पूरे छत्तीसगढ़ में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गईं. अब बारी थी छत्तीसगढ़ से बाहर निकलने की. वे बताती हैं कि एक बार राजनांदगांव में उनका कार्यक्रम चल रहा था. भारी भीड़ थी. लोग पेड़ों पर चढ़कर पंडवानी सुन रहे थे. उसी समय मध्यप्रदेश कला परिषद के कुछ लोग राजनांदगांव आए हुए थे. उन्होंने वह कार्यक्रम देखा. भोपाल गए तो भारत भवन के अधिकारियों के साथ इस सारे में बात की. कुछ दिनों बाद भारत भवन भोपाल से कुछ लोग तीजन को खोजते मशहूर पंडवानी गायक झाडूराम देवांगन के यहां आ धमके. उन्होंने पूछा, आपके यहां की एक लड़की बहुत सुंदर पंडवानी गाती है, वह कौन है और कहां रहती है? झाडूराम ने बताया कि उसका नाम तीजन है और वह भिलाई के पास गनियारी में रहती है. भिलाई में उसका पता कोई भी बता देगा.
अधिकारी भिलाई पहुंचे और एक छोटी सी चाय-नाश्ते की दुकान पर तीजन का पता पूछा. झाडूराम की बात सच निकली. दुकादार ने न केवल तीजन का पता बताया, बल्कि उस रिक्शेवाले से भी मिलवा दिया तो अक्सर तीजन को छोड़ने उनके घर जाया करता था. अधिकारी रिक्शेवाले के साथ टैम्पो में बैठकर तीजन के घर पहुंचे. तीजन ने अधिकारियों को चाय पिलाई और फिर आने का कारण पूछा. अधिकारी बोले, वे उनका कार्यक्रम भारत भवन भोपाल में कराना चाहते हैं. तीजन के लिए यह बड़ा दिन था, उन्होंने फौरन हामी भर दी. कुछ दिनों बाद भारत भवन में उनका प्रोग्राम हुआ और हमेशा की तरह उन्होंने अपनी गायकी और अदायगी से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.
भारत भवन के उस प्रोग्राम के बाद तीजन की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी. एक के बाद एक वे बड़े मंचों पर पंडवानी का जादू बिखरने लगीं. उनका यह जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा. 1988 में महज 32 साल की तीजन को भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा. साल 2003 में उन्हें पद्मभूषण और फिर 2019 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. उन्हें संगीत नाटक अकादमी, नृत्य शिरोमणी जैसे दर्जनों पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं. देश के चार विश्वविद्यालयों ने उन्हें डीलिट् की मानद उपाधि दी है. पिछले वर्ष जापान ने उन्हें प्रतिष्ठित फुकुओका सम्मान से नवाजा है. दुनिया के तमाम देशों में उनकी पंडवानी के कार्यक्रम लगातार होते रहते हैं.
कापालिक शैली की पहली पंडवानी गायिका
तीजन बाई कापालिक शैली की पहली पंडवानी गायिका हैं. वे खड़े होकर पंडवानी गाती हैं. उस समय के बड़े पंडवानी गायक झाड़ूराम देवांगन और पुनाराम निषाद बैठकर गाते थे। उनकी शैली वेदमती कहलाती है. तीजन बताती हैं कि यह नामकरण भोपाल के एक कार्यक्रम के दौरान हुआ। वहां झाड़ूराम देवांगन और पुनाराम निषाद भी थे. अधिकारियों ने पूछा, आप लोग किस शैली में गाते हैं? चर्चा में निकलकर आया कि तीजन जो गाती हैं, वह कल्पना पर आधारित है, इसलिए वह कापालिक शैली है. झाड़ूराम और पुनाराम जो गाते हैं, वह वेदसम्मत है, इसलिए वह वेदमति शैली है.
बच्चों की खातिर ठुकरा दी पहली विदेश यात्रा
पेरिस में भारत फेस्टिवल हो रहा था और इसका निमंत्रण उन्हें भी मिला था. उस समय उनके तीन बच्चे थे, जिनकी देखभाल उन्हें करनी थी. इसलिए उन्होंने पेरिस जाने से मना कर दिया. तीजन को समझाने के लिए भारत भवन बुलाया गया. तीजन और उनके रागी भोपाल गए. अधिकारियों ने उनसे पेरिस जाने का निवेदन किया और कहा- चले जाइये, जिंदगी आपको कुछ बड़ा करने का मौका दे रही है. तीजन मान गईं और जाने के लिए हामी भर दी. तीजन को जहाज में जाने से भी डर लग रहा था. पेरिस का निमंत्रण ठुकराने के पीछे यह भी एक कारण था.
भीम हैं सबसे ज्यादा पसंद
तीजन को महाभारत की कथा में सबसे ज्यादा भीम पसंद हैं. भीम का जोश, उनकी ताकत और गर्जना उन्हें बहुत पसंद है. द्रोपदी का पात्र भी अच्छा है, लेकिन उसमें दुख बहुत हैं. कुंती भी पसंद हैं.
पद्मश्री कहने से नाराज हो जाती थीं
वे तीजा के दिन पैदा हुई थीं. इसलिए उनका नाम तीजन बाई पड़ा. तीजा छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख लोक पर्व है. पद्मश्री मिलने के बाद लोग उन्हें पद्मश्री तीजन बाई के नाम पुकारते थे. ऐसा सुनकर तीजन बाई नाराज हो जातीं. उन्हें लगता लोग उनका नाम बिगाड़ रहे हैं. वे लोगों ने कहतीं- उनका नाम तीजन बाई है और वे उन्हें तीजन बाई के नाम से ही पुकारें. बाद में लोगों ने समझाया कि पद्मश्री लगाकर बोलना उनके प्रति सम्मान है.
लिम्का बुक को समझ लिया पीने का लिमका
जब लिम्का बुक में उनका नाम आया तो लिम्का बुक की तरफ से एक महिला ने फोन पर बधाई देते हुए उन्हें यह जानकारी दी। तीजन ने पीने वाला लिम्का सुना था। उन्होंने फौरन कहा कि वे कोई विज्ञापन नहीं करतीं. कंपनी के अधिकारियों ने भिलाई स्टील प्लांट के अफसरों से बात की, जहां तीजन काम करती थीं. उन्होंने तीजन को बताया कि वे विज्ञापन करने नहीं, अवार्ड देने के लिए बोल रहे हैं. तीजन यह किस्सा सुनाते हुए ठहाका लगाकर हंसती हैं.
इंदिरा गांधी से कहा- महाभारत करवाती नहीं सुनाती हूं
तीजन का कार्यक्रम एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने हुआ. कार्यक्रम के बाद इंदिरा ने तीजन की पीठ थपथपाई और कहा- छत्तीसगढ़ में महाभारत करवाती हो? तीजन से तपाक से कहा, नहीं मैडम मैं महाभारत सुनाती हूं. पास में ही हबीब तनवीर भी खड़े थे. इंदिरा गांधी ने उनसे कहा देखा हबीब लड़की कैसे जवाब दे रही हैं. बहुत होशियार लड़की है. फिर उन्होंने हंसते हुए तीजन की पीठ थपथपाई.
जनता ने ऊपर उठाया
तीजन को ऊंचा उठाने में सबसे बड़ा योगदान किसका रहा? इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, उन्हें जनता ने ऊपर उठाया. वे आज जो कुछ भी हैं, जनता के प्यार की बदौलत हैं. जनता ने उन्हें बेशुमार प्यार, अपनापन और सम्मान दिया है, जिसके लिए वे हमेशा जनता की आभारी रहेंगी.
बचपन में उठा ले गया था कुत्ता
तीजन बताती हैं- मेरा जन्म हुए 5-6 दिन ही हुए थे। मां मुझे झोपड़ी में सुला कर नहाने गई थीं. तभी एक कुत्ता आया और मुझे कमर के पास से पकड़कर ले जाने लगा. मां ने देखा तो जोर-जोर से चिल्लाने लगीं. आसपास के लोग दौड़कर आए. कुत्ते का पीछा किया तो वह उन्हें एक पत्थर के पास छोड़ गया. किस्मत से तीजन को एक खरोंच भी नहीं आई.
पोते से हैं उम्मीदें
अपने परिवार में पंडवानी को लेकर तीजन को अपने 18 साल के पोते सौरभ से बेहद उम्मीदें हैं. सौरभ ने चार सार्वजनिक कार्यक्रम दिए हैं और जमकर वाहवाही बटोरी है. तीजन कहती हैं, उसमें प्रतिभा है. अगर, मेहनत करेगा तो आगे बढ़ जाएगा. वे छत्तीसगढ़ समेत देश के अलग-अलग राज्यों के कुल 270 बच्चों को पंडवानी का प्रशिक्षण दे रही हैं. कुछ लड़कियों में उन्हें संभावना दिख रही है.
बायोपिक भी बन रही
तीजन की प्रसिद्धि बॉलीवुड तक पहुंच चुकी है. नवाजुद्दीन सिद्दकी की पत्नी आलिया उन पर एक बायोपिक बनाने की तैयारी कर रही हैं. आलिया और उनकी टीम पिछले साल कई बार तीजन से मिलने आ चुकी है. बायोपिक को लेकर कांट्रेक्ट भी हो चुका है. इसके जल्द बनने की उम्मीद की जा रही है. चर्चा है, बायोपिक में अमिताभ बच्चन तीजन के नाना का किरदार निभा सकते हैं. तीजन का रोल कौन करेगा, इस बारे में अभी कोई खुलासा नहीं हुआ है. फिल्म अभिनेता रणवीर कपूर भी उनसे मिलने उनके घर आ चुके हैं.
असल के साथ आगे बढ़ने की सीख
तीजन को लगता है कि कला के लिए जो हिम्मत और लगन चाहिए, वह नए पंडवानी कलाकारों में नहीं दिखती. अभी जो लोग पंडवानी गा रहे हैं, वहीं लोग पंथी और ददरिया भी गा रहे हैं. भजन और रामायण भी गा रहे हैं. कथा को तोड़-मरोड़ रहे हैं. तीजन कहती हैं कि उन्होंने कभी नकल नहीं की. जब असल उनके पास है तो वे नकल क्यों करें. शायद इसीलिए वे इस मुकाम तक पहुंच पाईं. नई पीढ़ी से भी वे बस यही कहना चाहती हैं।
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