रमेश अनुपम/
कौन जानता था कि रायपुर के बैजनाथपारा के हाफिज अहमद खान के परिवार में जन्मे और पले-बढ़े हबीब अहमद खान एक दिन पूरी दुनिया में हबीब तनवीर के नाम से पहचाने जाएंगे. यह भी किसे मालूम था कि एक दिन बैजनाथपारा का यह हबीब अपने नाटकों के कारण पूरी दुनिया में पूजा जायेगा. राज्यसभा सदस्य तथा पद्मभूषण अलंकार से भारत सरकार द्वारा जिन्हें नवाजा जाएगा.
हबीब अहमद खान की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा रायपुर में संपन्न हुई. उन्होंने प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की. उनके वालिद उन्हें आईसीएस बनाना चाहते थे, सो उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए मॉरिस कॉलेज नागपुर भेजा गया.
हबीब अहमद खान ने बीए में प्रवेश लिया, जबकि उनके वालिद द्वारा उन्हें बीएससी में पढ़ने के लिए नागपुर भेजा गया था. यह संयोग ही था कि किशोर साहू भी उन्हीं दिनों मॉरिस कॉलेज में बीए की पढ़ाई कर रहे थे और हबीब से सीनियर थे.
उन दिनों कॉलेज में किशोर साहू के नाटकों की धूम थी. नाटक और सिनेमा के दीवाने तो हबीब साहब भी थे. बचपन से ही नाटकों के प्रति ललक उनके बड़े भाई साहब लगा ही चुके थे.
मॉरिस कॉलेज में बीए तक पढ़ाई करने के पश्चात आगे एमए की पढ़ाई के लिए उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की ओर रुख किया. तब तक नाटकों तथा फिल्मों के प्रति उनका रुझान इस कदर परवान चढ़ चुका था कि उन्होंने पढ़ना-लिखना छोड़कर बंबई की ओर रुख करना ही ज्यादा मुनासिब समझा.
बंबई में वे सन 1944-45 में इंडियन पीपुल्स थियेटर से जुड़ गए. उन दिनों शम्भु मित्र, बलराज साहनी, दीना पाठक, बिजन भट्टाचार्य, सलिल चौधरी जैसे लोग बंबई इप्टा में सक्रिय थे. उनके साथ उन्होंने नाटकों में काम किया. उनकी अभिनय प्रतिभा को देखकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने उन्हें अपनी फिल्मों में काम दिया. पर हबीब तनवीर सिनेमा के लिए नहीं बने थे, इसलिए बहुत जल्द उन्होंने बंबई की फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिल्ली की ओर रुख किया.
दिल्ली आकर नाटकों की दुनिया में रमते चले गए. सन 1954 में उन्होंने नजीर अकबराबादी को केंद्र में रखकर ‘आगरा बाजार’ नामक नाटक लिखा. 1954 में ही दिल्ली में इस नाटक का प्रदर्शन भी किया.
इस बीच लंदन के रॉयल स्कूल आॅफ ड्रामेटिक आर्ट में नाट्य प्रशिक्षण हेतु उनका चयन हो गया. इसलिए वे लंदन रवाना हो गए. लंदन में रहते हुए उन्होंने संपूर्ण यूरोप के थियेटर को बेहद निकट से देखा. बर्लिन में उन्होंने बर्टोल्ट ब्रेख्त के थियेटर के महत्व को समझा. तब तक थियेटर की दुनिया में ब्रेख्त का डंका बजने लगा था.
1958 में हबीब तनवीर भारत लौटे. घर वालों से मिलने वे रायपुर आए. रायपुर में उन्हीं दिनों गवर्नमेंट स्कूल में रात में नाचा का आयोजन हुआ. हबीब तनवीर सारी रात नाचा देखते रहे.
नाचा ने हबीब तनवीर की आंखे खोल दी. छत्तीसगढ़ी कलाकारों के अभिनय और गायन ने न केवल उन्हें चकित किया वरन उनके लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए. ब्रेख्त के थियेटर का महत्व अब उन्हें ज्यादा समझ में आने लगा था.
दिल्ली लौटकर उन्होंने शुद्रक के सुप्रसिद्ध नाटक ‘मृच्छकटिक’ को ‘मिट्टी की गाड़ी’ के नाम से प्रस्तुत किया, पर बात बनी नहीं.
1970 में उन्होंने इस नाटक को छत्तीसगढ़ी नाचा के कलाकारों के साथ, पारंपरिक रूप में फिर से दिल्ली में प्रदर्शित किया. इस बार छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकारों ने दिल्ली में धूम मचा दी. दिल्ली का थियेटर जगत हबीब तनवीर के इस प्रयोग तथा छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकारों के सहज सरल अभिनय को देखकर अभिभूत था. यह हबीब तनवीर के थियेटर का एक नया प्रस्थान बिंदु सिद्ध हुआ.
हबीब तनवीर ने ब्रेख्त के थियेटर से लोक संवेदना के जिन तत्वों को जाना और समझा था उसे ही वे ठेठ देसी रंग में अपने थियेटर में आजमा रहे थे.
1975 हबीब तनवीर के जीवन का स्वर्णिम वर्ष साबित हुआ. इसी साल नया थियेटर द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘चरणदास चोर’ ने नाटकों की दुनिया में तहलका मचा दिया. मदन लाल, लालूराम, ठाकुर राम, भुलवा राम, गोविंद राम निर्मलकर, शिवदयाल देवदास, रामचरण निर्मलकर, रामलाल निर्मलकर, बाबूदास, फिदा बाई, माला बाई जैसे छत्तीसगढ़ी कलाकारों ने अपने अभिनय और गायन का डंका बजा दिया.
1982 में इंग्लैंड के एडिनबरा में आयोजित इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल ‘फ्रिंज फेस्टिवल’ में ‘चरणदास चोर’ को प्रथम पुरस्कार से नवाजा गया. छत्तीसगढ के नाचा कलाकारों ने पूरी दुनिया को अपने अभिनय और गायन से जैसे जीत लिया था.
हबीब तनवीर ने भारतीय रंगमंच को ही नहीं, छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को भी पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित करने में जो अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, उसे भूला पाना मुश्किल है.
‘आगरा बाजार’ ‘बहादुर कलारिन’, ‘मोर नाव दामाद गांव के नाव ससुराल’, ‘साजापुर की शांतिबाई’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘चरणदास चोर’आदि हबीब तनवीर के महत्वपूर्ण नाटक हैं.
हबीब तनवीर न केवल रायपुर और छत्तीसगढ़ के बल्कि देश और दुनिया के गौरव हैं. हबीब तनवीर के बिना रायपुर और छत्तीसगढ़ का इतिहास लिखा जाना कभी संभव नहीं होगा.
पर यह पीड़ा हम सभी छत्तीसगढ़वासियों को न जाने कब तक सालती रहेगी कि हमारे इस प्रदेश ने हबीब तनवीर की स्मृति में अब तक ऐसा कुछ नहीं किया है, जिस पर हम नाज कर सकें.
क्या हबीब तनवीर के बिना हम छत्तीसगढ़ को एक नया छत्तीसगढ़ बना सकते हैं? गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ का नारा लुभावना तो है पर हबीब तनवीर जैसे छत्तीसगढ़ के अनमोल रत्न के बिना हम नवा छत्तीसगढ़ कैसे गढ़ पाएंगे? यह हम सबके लिए सोच का विषय होना चाहिए.
(रमेश अनुपम छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी हैं.)
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