छत्तीसगढ़ गाथा डेस्क/
छत्तीसगढ़ अंचल में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत तथा कला जगत के धूमकेतु की उपमा से विभूषित दाऊ रामचंद्र देशमुख ने अपनी लोककला और लोकगीत के माध्यम से शोषण और अभावों से जूझते छत्तीसगढ़ अंचल को जागृत करने की सार्थक पहल की. छत्तीसगढ़ी समाज के अभावग्रस्त जीवन एवं पीड़ा ने उन्हें इतना मर्माहत किया कि यही उनकी प्रस्तुतियों का मूल स्वर बन गया.
दाऊ रामचंद्र देशमुख का जन्म 25 अक्टूबर 1916 को दुर्ग जिले के पिनकापार गांव में हुआ. उनके पिता गोविंद प्रसाद एक संपन्न किसान थे. रामचंद्र को बचपन से ही नाचा और नाटक देखने का शौक था. बाद में वे खुद भी पारंपरिक नाटकों तथा रामलीला में भाग लेने लगे.
प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालयों में पूरी करने के बाद रामचंद्र देशमुख ने नागपुर विश्वविद्यालय से कृषि विषय में स्नातक की उपाधि हासिल की. नागपुर विश्वविद्यालय से ही उन्होंने वकालत की परीक्षा भी उत्तीर्ण की. अपनी शिक्षा और पैतृक संपत्ति के बलबूते वे एश-ओ-आराम की जिंदगी बिता सकते थे, लेकिन उन्होंने समाज और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना.
देश में उन दिनों स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था. महात्मा गांधी के संपर्क में आने के कुछ समय बाद रामचंद्र देशमुख वर्धा आश्रम चले गए. वहां उन्होंने एक कर्मठ स्वयंसेवक के रूप में मानव सेवा, सादगी और सत्याचरण का संकल्प लिया. वे वहां आश्रम की सफाई एवं रोगियों की सेवा किया करते थे.
इसी बीच प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी डॉ. खूबचंद बघेल की पुत्री राधाबाई का विवाह रामचंद्र देशमुख से कर दिया गया. विवाह के बाद रामचंद्र देशमुख दुर्ग जिले के बघेरा गांव में रहने लगे और वहां उन्होंने उन्नत कृषि अनुसंधान के साथ-साथ स्थानीय जड़ी बूटियों से गठिया, वात और लकवा जैसी गंभीर बीमारीयों का इलाज करते हुए जीवन व्यतीत करने लगे. लोग उन्हें बघेरा के दाऊ के नाम से जानने लगे. आस-पास के गांव में वे एक कुशल वैद्य के रूप में जाने जाते थे.
छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल की स्थापना की
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, लोककला एवं लोकजीवन के प्रति उन्हें प्रारंभ से ही लगाव था. गांव में रहने के कारण वे ग्रामीणों के दुख-दर्द और समस्याओं से भली-भांति परिचित थे. यही कारण था की 1950 में रामचंद्र देशमुख ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर ‘छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंडल’ की स्थापना की. इसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ लोगों को नसीहत देना था.

नाचा को सामाजिक दायित्व बोध से जोड़ा
दाऊ रामचंद्र देशमुख ने तत्कालीन नाचा शैली को पारिष्कृत किया और उसे सामाजिक दायित्व बोध से जोड़ने की कोशिश की. उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को चुन-चुन कर एक मंच पर एकत्रित किया. इनमें मदन निषाद, लालूराम, ठाकुर राम, बाबूदास, भुलवा दास, माला बाई और फिदा बाई जैसे कलाकार प्रमुख हैं. उनकी संस्था ने 1951 में ‘नरक अउ सरग’ नामक नाटक किया, जिसे काफी प्रशंसा मिली. इसी बीच उनकी संस्था के अधिकांश कलाकार प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर के साथ दिल्ली चले गए. छत्तीसगढ़ की लोक कला को इससे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली. कलाकारों को भी जमकर प्रसिद्ध मिली.

चंदैनी गोंदा को बनाया आंचलिकता का स्वर
1954 से 1969 तक दाऊ रामचंद्र देशमुख ने अपना सारा समय जनसेवा और समाज सुधार के कार्यों में लगाया. मंच के माध्यम से जन चेतना विकसित करने की योजना उनके मन मस्तिष्क को झकझोरती रही. छत्तीसगढ़ के सम्मानबोधक व संस्कृति के प्रतीक ‘चंदैनी गोंदा’ के लिए दाऊ रामचंद्र देशमुख ने दिन-रात एक कर दिया. उन्होंने फिर से कलाकारों को एकत्रित किया और उन्हें एक मंच पर लाने में सफल हुए. चंदैनी गोंदा के जरिए उन्होंने अपनी 50 वर्षों की कला साधना, अंचल की सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर का सफल प्रदर्शन किया. देखते ही देखते चंदोनी गोंदा छत्तीसगढ़ की आंचलिकता का स्वर बन गया. इसका मंचन उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश में सफलतापूर्वक किया गया. अखिल भारतीय लोककला महोत्सव यूनेस्को द्वारा भोपाल में आयोजित सम्मेलन में इस कार्यक्रम की जमकर सराहना की गई.
चंदैनी गोंदा में रामचंद्र देशमुख अभिनय भी किया करते थे. वे उसमें ‘दुखित’ का किरदार निभाया करते थे. वे अपने किरदार में इस कदर डूब जाते थे कि लगता ही नहीं था कि वे अभिनय कर रहे हैं. ऐसा लगता था, जैसे दुखित उनकी आत्मा में बस गया है. वे अपने अभिनय से किरदार को जिंवत बना देते.
लोकमंच से साहित्यकारों को जोड़ा
दाऊ रामचंद्र देशमुख के प्रयासों से अनेक साहित्यकार लोककला मंच की ओर आकर्षित हुए. पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी. प्यारेलाल गुप्त, नारायण लाल परमार, कोदूराम दलित, दानेश्वर शर्मा, विनय कुमार पाठक, खुमान साव, भैयालाल हेड़ऊ, लक्ष्मण मस्तूरिया, पवन दीवान, मुकुंद कौशल, प्रेम साइमन जैसे अनेक साहित्यकार व कलाकार उनके मंच के कार्यक्रमों में शामिल हुए.

‘कारी’ और ‘देवार डेरा’ ने छोड़ी अमिट झाप
इस सफलता से प्रेरित होकर दाऊ रामचंद्र देशमुख ने 1984 में प्रख्यात साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा रचित ‘कारी’ नाटक का मंचन किया. इसमें नारी उत्पीड़न व सामाजिक कुरीतियों पर जबरदस्त चोट की गई. आंचलिक संवेदना को बिम्बों के माध्यम से प्रस्तुत करने में कारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा. इसका निर्देशन रामह्दय तिवारी ने किया था.
रामचंद्र देशमुख की अगली प्रस्तुति ‘देवार डेरा’ थी. इसमें नृत्य और संगीत के लिए समर्पित देवार जाति की तत्कालीन समाज में उपेक्षा और शोषण को चित्रित करने के साथ उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए सरकार का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया था.
चंदैनी गोंदा की खुशबू से महकता रहेगा छत्तीसगढ़
13 जनवरी 1998 को 82 वर्ष की उम्र में हृदय गति रुक जाने से दाऊ रामचंद्र देशमुख का निधन हो गया, लेकिन छत्तीसगढ़ अंचल में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जो काम उन्होंने किया है, उसकी बदौलत वे लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे. उनके चंदैनी गोंदा की खुशबू से छत्तीसगढ़ हमेशा महकता रहेगा.
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