वे कहीं गए हैं, बस आते ही होंगे
2023-05-05
दिवाकर मुक्तिबोध/ ‘शिष्य. स्पष्ट कह दूं कि मैं ब्रम्हराक्षस हूं किंतु फिर भी तुम्हारा गुरु हूं. मुझे तुम्हारा स्नेह चाहिए. अपने मानव जीवन में मैंने विश्व की समस्त विद्या को मथ डाला, किन्तु दुर्भाग्य से कोई योग्य शिष्य न मिल पाया कि जिसे मैं समस्त ज्ञान दे पाता. इसलिए मेरीContinue Reading





