छत्तीसगढ़ गाथा डेस्क.
बस्तर के अंतिम छोर पर बसे बीजापुर की कवियत्री पूनम वासम ने कविताओं की वजह से देशभर में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. पूनम की कविताओं में बस्तर की लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है, तो बस्तर का दर्द भी उभर कर सामने आता है. अपनी अनूठी भाषा शैली और शिल्प के कारण पूनम की कविताएं देशभर में पसंद की जाती हैं. बीजापुर जैसे पिछड़े और अति-संवेदनशील इलाके से किसी कवियत्री का निकलना और राष्ट्रीय मंचों पर दमदारी के साथ अपनी जगह बनाना पूरे अंचल के लिए एक बड़ी उपलब्धि है.
पूनम को कविताएं लिखने का शौक स्कूल के दिनों से था, लेकिन तब वे प्रेम कविताएं लिखा करती थीं. उनकी कविताएं स्थानीय अखबारों में छपती थीं. बाद के दिनों में ‘आकंठ’ और ‘सर्वनाम’ जैसी पत्रिकाओं में भी उनकी कविताएं छपीं. 2003 में शादी के बाद पूनम ने कविताएं लिखना बंद कर दिया. 11-12 वर्षों तक उन्होंने कोई कविता नहीं लिखी, लेकिन 2016 में वे एक बार फिर कविताओं की ओर मुड़ीं. एक-दो कविताएं लिखकर फेसबुक पर पोस्ट किया. लोगों ने कविताओं को पसंद किया. इससे उनको भरोसा हुआ कि वे अब भी कविताएं लिख सकती हैं. इसके बाद पूनम ने जो कविताएं लिखीं, वे हम सबके सामने हैं.
पूनम की कविताएं न केवल देशभर में पंसद की गईं, बल्कि बेहद चर्चित भी हुईं. पूनम को छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा पुनर्नवा पुरस्कार 2020 व अमर उजाला शब्द सम्मान 2022 से सम्मानित किया जा चुका है. 20 नवंबर को पूनम देश के प्रसिद्ध टीवी चैनल ‘आज तक’ के कार्यक्रम ‘साहित्य आज तक’ में शामिल हुईं.

पूनम का जन्म 1 जनवरी 1980 को जगदलपुर में हुआ. उनकी स्कूली शिक्षा जगदलपुर के महारानी लक्ष्मीबाई हायर सेकंडरी स्कूल से हुई. उच्च शिक्षा में उन्होंने बीए और फिर दो-दो विषयों समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में एमए किया. वे ‘आत्म समर्पित नक्सलियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन- बीजापुर जिले के विशेष संदर्भ में’ विषय पर अपना शोघ कार्य पूरा कर चुकीं हैं. पूनम की शादी 2003 में शैलेश वासम से हुई. श्री वासम पेशे से इंजीनियर हैं. शादी के बाद पूनम जगदलपुर से बीजापुर आ गईं. वे बीजापुर में ही शासकीय शिक्षिका हैं.
पूनम बताती हैं कि जब पीएचडी कोर्स वर्क के सिलसिले में उनका जगदलपुर में रहना हुआ, उस दौरान उन्होंने बहुत सारे कवियों की कविताएं पढ़ीं. उनकी आंखों के सामने बहुत सी कविताएं गुजरीं, जो बस्तर और आदिवासियों को केंद्रित कर लिखी गई थीं. उन्होंने चंद्रकात देवताले की कविता- ‘हाई कमान नंगे बस्तर को कपड़े पहनाएगा’ पढ़ी. इस कविता ने उन्हें बस्तर पर लिखने के लिए अंदर से प्रेरित किया. उन्हें लगा कि जिस जगह में आप रहते हैं, जिस जगह को अच्छे से जानते हैं, महसूस करते हैं, उस जगह के बारे में आप क्यों नहीं लिख सकते? फिर उन्होंने बस्तर की संस्कृति और लोगों की आवाज को कविता में ढालने का निर्णय लिया.
पूनम कहती हैं, ‘बस्तर को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां हैं. बस्तर की जब भी बात होती है, पिछड़ापन, अतिसंवेदनशील, हिंसा जैसी नकारात्मक चीजें ही दिखाई-बताई जाती हैं, लेकिन बस्तर बदल रहा है. बस्तर के लोगों की सोच बदल रही है. बस्तर के स्थानीय लोगों ने हर क्षेत्र में खुद को स्थापित किया है. अपना ओहदा, मुकाम हासिल किया है. बस्तर की अपनी लोक संस्कृति, लोकरंग और लोक जीवन है. लोगों में सहजता, सरलता और निश्छलता है. ऐसे निश्छल लोगों की जब भी बात होती है, तब हम उनको एक सभ्यता से किनारे काटकर फेंक देते हैं. हमको लगता है वे नैपथ्य के लोग हैं, आदिवासी लोग हैं. हमारी सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, लोकोत्सव पर नकारात्मक चीजें हावी हो जाती हैं. हमारी अच्छाइयां बाहर नहीं आ पातीं.
यहां की संस्कृति में बड़ी विविधता है. हर पांच किलोमीटर में बोलियां बदल जाती हैं. स्थानीय संस्कृति, लोकरंग पर बहुत काम करने की जरूरत है. दुुनिया को जानना चाहिए कि इस देश में बस्तर जैसा एक अदभुत क्षेत्र भी है, जहां केवल नक्सलवाद नहीं है, जहां केवल बारूद का ढेर नहीं है, बल्कि वहां की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान देश में सबसे अलग है. जिसकी लोक संस्कृति, लोक रंग, लोग गीतों में जीवन की धड़कन सुनाई देती है.
आप बस्तर आते हैं, तो देखते हैं, वहां की महिलाएं, पुरुष, बच्चे रास्ते पर पैदल चलते हुए, सड़क पार करते हुए, पूरा रास्ता खाली होने पर भी एक-दूसरे के आजू-बाजू नहीं चलते, किसी को क्रास नहीं करते. वे हमेशा एक लाइन में, लय में चलते हैं. वे कितने अनुशासित हैं. खाली सड़क पर भी तेज चलकर एक-दूसरे से आगे निकल जाने का ख्याल उनके मन में नहीं आता. वे एक-दूसरे के पीछे चलना पसंद करते हैं. एक-दूसरे को साथ लेकर. उनके जीवन में कितना अनुशासन है. इतने अनुशासित लोग दुनिया को कितना कुछ बेहतर दे सकते हैं, इस बारे में सोचे जाने की जरूरत है.
बस्तर प्रकृति की खूबसूरती से भरपूर है. यहां का पूरा जनजीवन प्रकृति पर आश्रित है. कम संसाधनों में भी कितने खुश हैं. यही खुशी उनके जीवन का असल है. मुझे लगता है, इस पर काम किया जाना चाहिए. नक्सलवाद, बारूद, बनाए गए, परोसे गए मुद्दे हैं. इससे इतर भी बस्तर को देखने की जरूरत है.’

वाणी प्रकाशन से आई पहली किताब
पूनम अपनी कविताओं की वजह से देशभर में जानी-पहचानी जाती हैं. उनका पहला और बेहद चर्चित कविता संग्रह ‘मछलिया गाएंगी एक दिन पंडुम गीत’ 2021 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. पूनम की कविताएं देश की विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. देश के कई बड़े मंचों पर उन्होंने कविता पाठ और वक्तव्य दिए हैं. आदिवासी विमर्श की कविताओं में पूनम देश का बड़ा नाम हैं. उनका दूसरा कविता संग्रह भी जल्द प्रकाशित होने वाला है.
कविताओं से ज्यादा प्रेम
पूनम कहती हैं, उन्हें कविताओं से ज्यादा प्रेम है. उनके भीतर कविताएं ही उतरती हैं. गद्य से पहले उनके जेहन में कविताएं आती हैं. कविताओं में कम शब्दों में आप अपनी बात कह लेते हैं और लोग चलते-फिरते भी उसे पढ़ लेते हैं. लेकिन गद्य के लिए ठहरना पड़ता है, रुकना पड़ता है. कविताएं सरलता से दिल में उतर जाती हैं. लोग उसे पढ़ना पसंद करते हैं. कविता एक ऐसा माध्यम हैं, जिसके जरिए बस्तर के लोगों की बात देश-दुुनिया तक आसानी से पहुंचाई जा सकती हैं. कहानी, उपन्यास या गद्य विधा पर भी काम करेंगी, लेकिन उससे पहले वे बहुत कुछ पढ़ना और जानना-समझना चाहती हैं. वे बस्तर में रहती हैं, जहां कहानियां ही कहानियां हैं. तो स्वाभाविक है आने वाले समय में गद्य और कहानियों पर भी काम होगा, लेकिन अभी तो केवल कविताएं हैं.
इन मंचों पर कविता पाठ और वक्तव्य
युवा कवि संगम, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय- 2017 लिटरेरिया कोलकाता-2017 भारत भवन, भोपाल, युवा 2018- रजा फाउंडेशन, दिल्ली बिटिया उत्सव, ग्वालियर साहित्य अकादमी, दिल्ली साहित्य अकादमी, भोपाल साहित्य अकादमी, रायपुर‘आज कविता’, रजा फाउंडेशन‘एक सांझ कविता की’, नीलांबर कोलकाता श्रीकांत वर्मा सृजन पीठ, बिलासपुर मण्डला कविता पाठ, रजा फाउंडेशन ‘अरुण कोलटकर’ की कविताओं पर वक्तव्य रजा फाउंडेशन, मंडला ‘साहित्य आज तक, दिल्ली दूरदर्शन (प्रादेशिक कार्यक्रम के अंतर्गत) पर कई बार कविता पाठ.
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